कभी टेक्सटाइल मिल से पहचान थी

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झुग्गी के इलाके के लोगों का कहना था कि गुजराती सीधे साधे माने जाते हैं और पटेल साहब को खुद को दबंग साबित करना था। इसके बिना सूद-ब्याज का धंदा तो झुग्गी के इलाके में चलता नहीं, सब पैसे दबा जाते। इसलिए पटेल साहब खुद को बिहारी घोषित करते थे। वरना बिहार में पटेल कहाँ होते हैं? खैर जो भी वजह हो, हमारी पटेल साहब से ठीक ठाक जमती थी। आठ घंटे वो एक होटल में वेटर की नौकरी करते और बाकी का दिन महाजनी।

एक रोज जब वो हथेली पर अंगूठे के बदले अनामिका से, हमेशा की तरह सुरती रगड़ रहे थे तो हमने पूछ लिया, पटेल साहब, सही में बिहारी हो क्या? वो थोड़ा रुके, सोचा, फिर बोले, अब तुमसे क्या छिपाना? तुम तो खुद ही बिहारी हो! हुआ यूँ कि हमारे दादाजी बक्सर आये थे वहां के कपड़ों की एक मिल में काम करने। तीन पीढ़ी से कोई वापस गुजरात गया ही नहीं, तो खुद को बिहारी ना कहें तो क्या कहें? घर के नाम पर जो दो कट्ठा जमीन और एक मकान है, वो तो बिहार ही में है।

थोड़ा मालूम किया तो पता चला कि डुमरांव राज परिवार ने 1968 में डुमरांव टेक्सटाइल मिल्स की स्थापना की थी। कभी इस मिल में करीब 1500 श्रमिक काम करते थे। डुमरांव राज परिवार की ही निगरानी में 2000 तक तो मिल ठीक चल रहा था। लगातार बढ़ते बिजली विभाग के शुल्क के कारण अचानक ही मिल पर करीब चार करोड़ का बिजली बिल बकाया हो गया। इतने बकाये पर मिल की बिजली काट दी गयी और मिल बंद हो गया। इसी दौर में कभी मिल में काम बंद होने पर पटेल साहब के पिता का रोजगार जाता रहा।

हो सकता है आपको लगे कि ये डुमराओं कौन सी जगह है जहाँ फैक्ट्री थी? बिहार में तो वैसे ही उद्योगों का अभाव है। अगर कहीं कोई मिल होती तो नाम सुना होता ना? तो हाल में जो चेतन भगत नाम के बेस्ट-सेलर लेखक की किताब आई थी “हाफ-गर्लफ्रेंड”, उसके नायक को याद कीजिये। अरे वही बिहारी जो दिल्ली जाकर अंग्रेजी सीखने की कोशिश कर रहा था! वो इसी जगह का तो बताया गया था ना? चूँकि उपन्यास को लेकर कुछ विवाद भी रहा था, इसलिए आपने डुमराओं और उसके राजपरिवार का नाम पढ़ा होगा।

खैर तो बक्सर जिले के डुमराओं इलाके का ये टेक्सटाइल मिल कभी सैकड़ों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता था। जाहिर है इस इलाके में रहने वाले इतने सारे कामगारों के लिए भोजन, कपड़े, रोजाना की जरूरतों के सामान वगैरह की दुकानों के जरिये भी रोजगार पैदा होता होगा। वैसे सरकार बहादुर ने इसे दोबारा शुरू करने की 2008 में एक कोशिश की थी। उस समय कोलकाता के पटवारी एसोसिएट्स को इस मिल के प्रबंधन का काम मिला। करीब तीन साल में जब सरकारी सहायता नहीं आई और मिल ने बिजली का बिल नहीं भरा तो बिजली कटी और मिल फिर से बंद हो गया।

मिल मैनेजमेंट ने वर्क-सुस्पेंड दिखाकर मजदूरों को वापस बिहार की बहार में भेज दिया। आज अगर पटना से दिल्ली की तरफ रवाना होंगे तो बक्सर पहुँचने से ठीक पहले दाहिनी तरफ इन्हीं मिलों के अवशेष दिखते हैं। मजदूर नेता कहते हैं कि दोबारा शुरू करना तो बस मिल की जमीनें बेचने की साजिश थी। अब उन जमीनों पर धड़ाधड़ निर्माण हो रहा है। जो भी हो, मजदूरों का रोजगार गया, बिहार के लिए राजस्व का एक स्रोत गया। व्यापार के जो अवसर यहीं उपलब्ध थे, उसके लिए भी अब लोग कोलकाता जाते हैं।

बाकी अगर कभी ये लगे कि बिहार, जिसका इतना गौरवशाली इतिहास रहा है, वहां पर संग्रहालय इतने कम क्यों हैं, तो चकित होने की जरूरत नहीं। यहाँ हर ओर उद्योगों के अवशेष दिखते तो हैं ही! आप गर्दन घुमाकर देखिये, पूरा बिहार ही तो इंडस्ट्री का म्यूजियम बना पड़ा है।

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