स्क्रैमजेट…

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मोटरसाइकिल आजकल सभी के पास होती है। आज के समय में यदि कहा जाये कि मोटरसाइकिल देश का राष्ट्रीय वाहन है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मोटरसाइकिल पेट्रोल से चलती है जो कि एक तरल ईंधन है। हम सभी सप्ताह में कम से कम दो बार पेट्रोल भरवाते हैं। कल्पना कीजिए कि यदि पेट्रोल पम्प हमारी गाड़ी के साथ साथ चले तो कैसा लगेगा। हमें रुक कर लाइन में लग कर पेट्रोल भरवाने का झंझट न करना हो तो क्या करना पड़ेगा। फिलहाल हमारे छोटे वाहनों के लिए तो यह सम्भव नहीं है किंतु भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने स्पेस टेक्नोलॉजी में ऐसा कर दिखाया है।

अंतरिक्ष में जाने वाले रॉकेट और स्पेसक्राफ्ट भी ईंधन का इस्तेमाल करते हैं। पहले के जमाने में ठोस ईंधन होते थे, ठीक वैसे ही जैसे दीवाली में पटाखे वाले रॉकेट छोड़े जाते हैं। उसमें बारूद होता है जिसके पलीते में चिंगारी लगाने से बारूद धरती की दिशा में बल उत्सर्जित करता है। जैसा कि न्यूटन बाबा कह गए हैं कि लगाये गए हर बल के विपरीत दिशा में समान रूप से बल लगता है तो इसी सिद्धांत पर धरती की ओर बल लगने से रॉकेट आसमान की ओर उड़ चलता है। इस प्रकार के ठोस ईंधन को solid propellant कहा जाता है।

अब जैसा कि हमारी मोटरसाइकिल में केवल पेट्रोल डालना ही काफी नहीं है, उस पेट्रोल जला कर ऊर्जा पैदा करने वाली भी कोई मशीन होनी चाहिये उसी प्रकार रॉकेट में भी बड़े बड़े इंजन होते हैं। रॉकेट के इंजन में मुख्यतः दो भाग होते हैं: एक- ईंधन और दूसरा ऑक्सीडाईज़र (oxidiser). ऑक्सीडाइज़ करने का अर्थ है ईंधन को ऑक्सीजन की मौजूदगी में जलाना क्योंकि हर चीज को जलने के लिए ऑक्सीजन की जरूरत होती है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि ऑक्सीजन खुद नहीं जलती, बल्कि ज्वलनशील पदार्थ को जलने में सहायता करती है। इसी को ‘combustion’ कहा जाता है। यह एक रासायनिक प्रक्रिया है जिसमें कोई चीज जब ऑक्सीजन की मौजूदगी में जलती है तो उस चीज में मौजूद तत्व ऑक्सीजन के साथ मिल कर एक नया यौगिक या compound बना लेती है। उसी तरह जैसे मोमबत्ती जलने पर कार्बन ऑक्सीजन के साथ मिलकर कार्बन डाई ऑक्साइड बना लेता है।

इस तरह हमने देखा कि इंजन में ऑक्सीजन का बड़ा महत्व है। बाद में रॉकेट का इंजन बनाने वालों ने सोचा कि क्यों न solid propellant की जगह तरल ऑक्सीजन का इस्तेमाल किया जाये। तरल ऑक्सीजन का घनत्व ज्यादा होता है यानि कम जगह में ज्यादा ईंधन समा सकता है इसलिए liquid oxygen को जला कर रॉकेट के प्रक्षेपण की विपरीत दिशा में ‘थ्रस्ट’ (thrust) पैदा किया जाता है। थ्रस्ट गणितीय रूप से बल से थोड़ा अलग होता है। जब किसी वस्तु पर लगने वाला बल क्षेत्रफल में प्रति स्क्वायर इंच या प्रति स्क्वायर मीटर के हिसाब से मापा जाता है तो उसे थ्रस्ट कहते हैं। रॉकेट का इंजन ईंधन को ऑक्सीडाइज़ कर नीचे की ओर धकेलता है तब रॉकेट ऊपर जाता है।

ठोस और तरल दोनों प्रकार के ईंधन के साथ यह समस्या है कि इन्हें स्पेस क्राफ्ट में ढोकर ले जाना पड़ता है। रॉकेट के कुल वजन का बड़ा हिस्सा यह ईंधन ही होता है। हमारी मोटरसाइकिल भी पेट्रोल भरवाने के बाद थोड़ी भारी महसूस होती है। इसका हल निकालने के प्रयास में पचास के दशक में ‘जेट’ इंजनों पर कई प्रयोग किये गए। जेट का अर्थ है तरल या द्रव का तेज़ बहाव। पौधों में पाइप से पानी डालते वक़्त जब आप अंगूठे से उसका रास्ता रोक लेते हैं तो वह और तेज़ी से बाहर निकलता है। ये पानी का एक छोटा सा जेट कहा जा सकता है। जेट ली का नाम भी सम्भवतः इसीलिये पड़ा होगा क्योंकि वो तेज़ी से कुंग फू करता था।

नासा ने जेट इंजन पर बहुत काम किया है। उनकी पूरी एक प्रयोगशाला है Jet Propulsion Lab जिसे संक्षेप में JPL कहते हैं। जेट इंजन थोड़े अलग होते हैं। जब मोटरसाइकिल का इंजन चलते चलते फ़टी सी आवाज़ निकालने लगता है तो मैकेनिक कहता है कि साहब इसका रिंग पिस्टन बदलना पड़ेगा। यह पिस्टन वाले इंजन कभी कभी टीवी पर कैस्ट्रॉल मोबिल के एडवरटाइज़मेंट में दीख जाते हैं। इसमें एक सिलिंडर में पिस्टन आगे पीछे करता है जो पेट्रोल को जलाता है और ऊर्जा पैदा करता है जिससे गाड़ी चल पड़ती है। हवाई जहाज में भी ऐसे इंजन का प्रयोग किया जाता था। लेकिन इसके साथ समस्या यह है कि यदि आपको ज्यादा शक्तिशाली इंजन चाहिये तो उतने ही बड़े पिस्टन और सिलिंडर लगाने पड़ेंगे। एयरोडायनामिक्स का एक सिद्धांत है कि यदि आपको तेज़ गति चाहिये तो वजन कम रखना पड़ेगा। इंजमाम उल हक़ अपने वजन के कारण तेज़ नहीं भाग पाता था और उसने सबसे ज्यादा रन आउट होने का रिकॉर्ड बनाया!

विमान को तेज़ गति देने के लिए पिस्टन वाले इंजन से छुटकारा पाना जरूरी था। इस तरह जेट इंजन का जन्म हुआ। जेट इंजन में ईंधन पीछे से खींच कर उसे जला कर आगे की ओर छोड़ा जाता है। ईंधन लेना और जलाना ये दोनों काम एक साथ होता है इसलिए जेट इंजन ज्यादा कुशल तरीके से तेज़ रफ्तार देता है जैसे बैटमैन की कार में पीछे से आग निकलती है और कार तेज़ी से दौड़ पड़ती है। जेट इंजन का संवर्धित रूप रैमजेट (Ramjet) है। रैमजेट से ज्यादा उन्नत तकनीक है स्क्रैमजेट (Scramjet). स्क्रैमजेट इंजन का पूरा नाम है Supersonic Combusting Ramjet. इस इंजन में ईंधन रूपी ऑक्सीजन डालना नहीं पड़ता बल्कि यह इंजन वातावरण में मौजूद ऑक्सीजन को ही सोख लेता है। ये वैसा ही होगा जैसे हमारी मोटरसाइकिल के संग पेट्रोल पम्प भी चलने लगे। हमें कहीं रुक कर ईंधन भरवाने की आवश्यकता नहीं होगी। स्क्रैमजेट हवा में ध्वनि की रफ्तार से भी तेज़ गति दे सकता है। इसरो ने 28 अगस्त 2016 को इसका सफल परीक्षण किया। ऐसी तकनीक विकसित करने वाले हम दुनिया के चौथे देश बन चुके हैं। अब हमारे स्पेसक्राफ्ट को तरल ऑक्सीजन ढो कर ले जाना नहीं पड़ेगा इससे वजन और प्रक्षेपण का खर्च दोनों घटेगा।

स्क्रैमजेट जैसी तकनीक विकसित करने में फ्लुइड डायनामिक्स (fluid dynamics) जैसे विषय की अहम भूमिका है। सीबीएसई कक्षा ग्यारह के छात्र भौतिकी की NCERT में थोड़ा बहुत फ्लुइड मैकेनिक्स पढ़ते हैं। आगे जाकर यह विषय पूर्ण रूप से गणितीय हो जाता है। गणित विभाग में Fluid mechanics के प्रोफेसर पाये जाते हैं। मजेदार यह कि पढ़ने पढ़ाने वालों को यह पता ही नहीं होता कि इस विद्या का स्कोप कितना बड़ा है। यह विषय और परिष्कृत होकर Computational Fluid Dynamics कहलाता है। इंजीनियरिंग के छात्र streamline flow, laminar flow इत्यादि पढ़ते हैं। फ्लुइड डायनामिक्स का उपयोग हर उस क्षेत्र में है जहाँ तरल और गैसीय पदार्थ हैं। CFD केवल हवाई जहाज और रेसिंग कार की एयरोडायनामिक्स डिज़ाइन ही नहीं बल्कि खगोल-भौतिकी यानि Astrophysics में बहुत काम आती है। तारों और बृहस्पति जैसे ग्रहों के अंदर मौजूद पदार्थ की संरचना द्रव रूप में होने के कारण यह विषय बहुत उपयोगी है।

इसरो ने ठोस और तरल इंजन के साथ क्रायोजेनिक इंजन भी बनाये हैं। पूरा इतिहास जानने के लिए इसरो की आधिकारिक वेबसाइट से उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक From Fishing Hamlet to Red Planet डाउनलोड करें और पढ़ें। हाल ही में इसरो ने Reusable Launch Vehicle का भी सफल परीक्षण किया था। यह RLV TD भविष्य के हमारे स्पेस शटल होंगे। इसमें भी स्क्रैमजेट इंजन लगा कर हम अंतरिक्ष में जा कर वापस लौट सकेंगे। यूनिवर्सिटी कॉलेज में पढ़ने वाले हमारे छात्रों को उन्नत thermodynamics, CFD, aerospace engg, applied mathematics जैसे विषय लेने और इनमें शोध करना चाहिये ताकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में वे भारत को स्क्रैमजेट की गति से आगे बढ़ा सकें।

~यशार्क पाण्डेय का लेख

(चित्र साभार न्यूज़ नेशन)

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