भारत में विज्ञान और संस्कृति – पिछड़ेपन का अपराधी कौन?

0
77

सैंतालीस साल पहले मानव ने चन्द्रमा पर कदम रखा था। तब नील आर्मस्ट्रॉंग ने कहा था, “That’s one small step for man, one giant leap for mankind.” मानव का यह छोटा सा कदम मानवता के लिए ऊँची छलांग है। उस जमाने में जब भारतवासी सिनेमा देख रहे होते थे कि ताज महल पिक्चर की हीरोइन चाँद से सीढ़ी लगा के उतर रही है और हीरो गाता था कि जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा तब तक अमेरिका चाँद पे जाने का वायदा निभा चुका था। तब से अब तक अमेरिका के पॉपुलर कल्चर में अपोलो 11 का अभियान रच बस गया है। असंख्य किताबें, डॉक्यूमेंट्री, सिनेमा, लेख इत्यादि लिखे जा चुके हैं और इससे जुड़े कलात्मक memorabilia भी लोग इकट्ठा करते हैं। रैम्स्टीन वालों ने ‘we are living in amerika’ बोल पर पैरोडी भी बनाई थी। हिस्ट्री चैनल पर एक प्रोग्राम आता है Pawn Stars. एक बार एक बच्चा pawn शॉप में अपोलो स्पेसक्राफ्ट की बाहरी सतह की जली हुई टाइल्स बेचने आता है। दूकान का मालिक रिक उसे खरीदता तो नहीं है लेकिन ये कह के लौटा देता है कि बेटा इसे सम्भाल के रखना यह अमेरिका के इतिहास से जुड़ी हुई चीज है।

ध्यान देने वाली बात ये है कि नील आर्मस्ट्रॉंग और बज़्ज़ एल्ड्रिन ने चन्द्रमा की सतह पर ‘मानवता’ का नहीं बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका का ध्वज फहराया था। याद रहे, इंदिरा गांधी ने स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा से भी यही पूछा था की ऊपर से ‘भारत’ कैसा दिखाई देता है। अपोलो 11 मिशन से हमें यह सीखना चाहिये कि अर्थशास्त्र की तरह विज्ञान की भी राजनीतिक सीमाएं होती हैं। इन सीमाओं का निर्धारण दो कारणों से जरूरी है। पहला तो यह कि विज्ञान अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक परिदृश्य को गहरे प्रभावित करता है। सूचना तकनीक से आई क्रांति मसलन बेंगलुरु से लेकर नॉएडा तक फैले Adobe Accenture Google जैसी अमेरिकी कम्पनियों के ऑफिस इसके गवाह हैं। दूसरे, विज्ञान किसी देश के लोगों के रहन सहन से लेकर आर्थिक प्रगति तथा सामरिक शक्ति को सुदृढ़ करता है। भारत इतने वर्षों में इन दोनों मानकों पर बुरी तरह फेल हुआ है। उदाहरण के लिए कम दाम में 20-25 सैटलाइट का प्रक्षेपण करना बड़ा काम नहीं। इसरो कोई ज्यादा डिस्काउंट वाली दूकान नहीं एक उच्च वैज्ञानिक शोध संस्थान है। जब हम खुद का अपना reusable vehicle बना लेंगे तब इसरो cutting edge technology तक पहुँचेगा। जैसे हमने एक समय परम सुपर कम्प्यूटर बनाया था। गत वर्ष जब गुरुत्व तरंगों की खोज की घोषणा होने वाली थी तो राज्य सभा टीवी ने अमेरिका से लाइव फीड लेकर दिखाया था। क्या किसी भारतीय मीडिया घराने ने अमेरिका या किसी भी दूसरे देश में मंगलयान पर प्रोग्राम दिखाने की ज़हमत उठाई?

धीमी वैज्ञानिक प्रगति आर्थिक गति को और धीमा करती है। सौ दिन चले अढ़ाई कोस की मानसिकता से उबरना पड़ेगा। कारण क्या हैं? बहुत सारे कारण हैं। भारतीय विज्ञान अकादमी का जर्नल current science उठा कर देख लीजिए, दो चार दस बारह ऑनलाइन मैगज़ीन देख लीजिए कुछ स्तरीय किताबें छान लीजिए आपको हज़ार समस्याएं मुंह बाए दिख जाएँगी जिनकी वजह से हम विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया से पीछे हैं। स्कूली शिक्षा से लेकर पीएचडी फेलोशिप तक का रोना रोया जाता है। रिसर्च में फंडिंग तो कम है ही मैंने एक और बात गौर की है। वह यह है कि भारत में विज्ञान में शोध करने वाले लोग समाज के प्रति अपना कोई उत्तरदायित्व नहीं समझते। अधिकांश पीएचडी के लड़कों के मन में यह बात होती है कि “यार मन नहीं लग रहा।” इस देश में किसी के पेट में वह आग नहीं जलती कि कुछ नया सोचें, कुछ अनोखा बनाएं। पीएचडी में दाखिला लेने के बाद उन्हें विज्ञान से ज्यादा अध्यात्म इतिहास में रुचि पैदा हो जाती है। बहुत से लोग तो पीएचडी छोड़ भी देते हैं। कहा जाता है कि one should have a fire in his belly. वो आग बहुत कम लोगों के अंदर जलती है।

इसका कारण कम फेलोशिप ही नहीं है। एक और कारण है। वो यह है कि हमनें अपने देश के वैज्ञानिक इतिहास का अध्ययन नहीं किया है। जब हम स्कूल में होते हैं तो हम भारत की उन्नीसवीं सदी की विज्ञान की विरासत का narrative नहीं जानते। इतना ही नहीं जब मैंने agriculture की किताब खोल कर देखी तो उसमें सारी परिभाषाएं विदेशी वैज्ञानिकों की थीं जबकि भारत कृषि को अपनाने वाली पहली सभ्यता थी। जगदीश बाबू, मेघनाद साहा या प्राचीन काल की बात छोड़ दीजिये हम ये तक नहीं जानते कि इस देश ने आज़ादी के बाद परमाणु ऊर्जा कैसे पैदा की या हमारा अपना सुपर कम्प्यूटर, सैटेलाइट प्रोग्राम, चन्द्रयान कैसे बना। हम भाभा, साराभाई, दौलत सिंह कोठारी, सतीश धवन, हरीश चन्द्रा, जैसे अनगिनत नाम नहीं जानते। यह कार्य कुछ फ़ालतू मैगज़ीन और विज्ञान प्रसार नामक निठल्ले सरकारी विभाग को दे दिया गया है। ये मैगज़ीन बिकती तो हैं लेकिन इन्हें पढ़ने से मार्कशीट पर नम्बर नहीं मिलते। इसीलिए हर कोई इन्हें मन से नहीं बल्कि मनोरंजन के लिए पढ़ता है। हम भारत के लोगों ने विज्ञान को मनोरंजन का साधन बना लिया है। गौरतलब है कि विदेशों में साहित्य को भी वैज्ञानिक रूप देकर science fiction लिखा जाता है। दो दशक पहले आई फ़िल्म Terminator में एक भविष्य की मशीन फर्श से निकल कर खड़ी होती दिखती है। यह material science नामक विषय का ही चमत्कार दिखाया था कि भविष्य में ऐसे पदार्थ हो सकते हैं जो कोई भी रूप धर सकें। परन्तु हमारे देश में विज्ञान में शोध करने वाले अधिकांश लोग ऐसे मिल जाएंगे जो स्वयं को आम समाज संस्कृति से ऊपर समझते हैं। उनके लिए देश के प्रति योगदान मायने नहीं रखता बल्कि विज्ञान के सिद्धांत ही मोक्ष का द्वार हैं।

भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों में आपको सैद्धांतिक शोध ज्यादा मिलेगा। गूढ़ गणितीय विधाओं में पारंगत लोग मिलेंगे जिन्हें केवल पेपर पेन की जरूरत होती है। कुछ नया प्रयोगात्मक अविष्कार करने वाले लोग कम मिलेंगे क्योंकि सरकारों ने उपकरणों के लिए फंडिंग करने में हमेशा उदासीनता ही दिखाई है। दक्षिण में अभी भी कुछ बड़े वैज्ञानिक India Based Neutrino Observatory स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं। वहाँ ज़मीन के लिए लोगों ने खून के आँसू रुला दिए हैं। ज़रा सोचिये सवा सौ करोड़ की पैंसठ प्रतिशत जनसंख्या में से कितने युवा और बच्चे आज से दस पन्द्रह साल बाद बड़े होंगे तो उनके हाथ में क्या होगा। अब्दुल कलाम कहते थे कि “विज्ञान और प्रौद्योगिकी से लैस होकर एक युवा भारतीय नागरिक होने के नाते मैं समझता हूँ कि छोटा लक्ष्य रखना एक अपराध है।”

क्या हम सब भारत के अपराधी नहीं?

~ यशार्क पाण्डेय का लेख

Leave a Reply