विलुप्त हो गई पटना की विरासत –पटना कलम

0
258
All-focus

मोनू कुमार, पटना: मानव सभ्यता की शुरूआत से ही चित्रकारी की कला का भी दौर शुरु हो गया था। मनुष्य ने चित्रकारी को अपने इर्द गिर्द हो रही घटनाओं को प्रस्तुत करने का जरिया बनाया। नतीजतन प्राचीन समय में ही लोगों ने गुफाओं पर चित्रकारी करने की कला विकसित कर ली थीं। जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। इन कलाओं में खास तौर से पशुओं के चित्र शामिल है। मध्य प्रदेश के भिंबेटिका की गुफाओं में आज भी ऐसे चित्र मौजूद है। ये लगभग तीस हजार साल पुराने है। अजंता और एलोरा की गुफाओं में बने चित्र, चित्रकला का अनूठा उदाहरण है।

यहकहना मुमकिन होगा कि, मानव सभ्यता के विकास के साथ ही चित्रकारी कला ने भी आकार लेना शुरु कर दिया था। अठारहवीं शताब्दी के दौरान भारत में पटना कलम का विकास हुआ। इस शताब्दी के मध्य में चित्रकला के तीन स्कूल थे – मुगल, आंग्लो-इंडियन और पहाड़ी। लेकिन पटना कलम ने इन सबके बीच तेजी से अपनी लोकप्रियता बनाई। लेकिन सही मायने में‘पटना कलम’ का विकास भारत की लघु चित्रकला शैली और ब्रिटिश शैली के संयोग से अंग्रेजों के संरक्षण में हुआ। और यह कला मुखरित होकर आम जीवन के बेहद करीब आई जिसमें लोगों की रोजमर्रा की जीवन शैली के चित्र उकेरने का सिलसिला शुरू हुआ। इसशैली को बाद में इंडो-ब्रिटिश शैली के नाम से भी जाना जाने लगा।

क्या है पटना कलम

पटना कलम की शुरूआत 1760 में हुई। यह शैली स्वतंत्र रूप से दुनिया की पहली ऐसी कला शैली थी जिसने आम लोगों और उनकी जिंदगी को कैनवास पर जगह दी। इसका विषय दूसरे चित्रकलाओं से भिन्न होता है। यह विषय पर केंद्रित होती है, इसलिए इसके पृष्ठ को सफेद ही रखा जाता है। तथा इसमें बार्डर नहीं होते है। पेन्टिंग आम जीवन पर आधारित होती है। इस कला के माध्यम से लोगों के रोजमर्रा के कार्य जैसे उनके व्यवसायको दर्शाया जाता है। सामान्यत: इस शैली में चित्रकारों ने व्यक्ति विशेष, पर्व-त्योहार, उत्सव, परिधान तथा जीव-जन्तुओं को महत्व दिया। इसमें रेखा कार्य ज्यादा होता है, रंगों पर विशेष जोर नहीं होता है। इस शैली में ब्रश से ही चित्रकला बनाने और रंगने का काम किया गया है। ब्रश गिलहरी के बालों से बनाये जाते थे। इसे कागज, अभ्रक तथा हाथी के दांत पर बनाया जाता था। अधिकांशत: गहरे भूरे, गहरे लाल, हल्का पीला और गहरे नीले रंगों का प्रयोग किया गया है। इस शैली के प्रमुख चित्रकार सेवक राम, हुलास लाल, जयराम, शिवदयाल लाल, ईश्वरी प्रसाद आदि हैं। चूंकि इस शैली के अधिकांश चित्रकार पुरुष हैं, इसलिए इसे ‘पुरुषों की चित्रशैली’ भी कहा जाता है।

पटना कलम की शुरुआत

वैसे तो वाटर कलर पर आधारित  इस शैली की शुरुआत मुगल दरबार के दौर की मानी जातीहै। लेकिन ब्रिटिश काल में इस कला को काफी तव्वजों दी गई। बात जब मुगल बादशाह अकबर के दरबार की करें तो, दो कलाकारों नोहर और मनोहर के बारे में कहा जाता है, कि इन दो दरबारी कलाकारों की वजह से इस कला को एक नई पहचान मिली। मुगल साम्राज्य के अंतिम समय में शाही दरबार में कलाकारों को प्रश्रय नहीं मिल रहाथा। जिस कारण वे अन्य क्षेत्रों में जाकर बस गए।बड़ी संख्या में चित्रकार पटना में आकर बस गए। इन चित्रकारों ने पटना के लोदी कटरा, मुगलपुरा, दीवान मोहल्ला, मच्छरहट्टा तथा नित्यानंद का कुंआ क्षेत्र में तथा कुछ अन्य चित्रकारों ने आरा और दानापुर में बस गए। फिर उन्होंने चित्रकला के क्षेत्रीय रूप को विकसित किया। यह चित्रकला शैली ही ‘पटना कलम’ या ‘पटना शैली’ कही जाती है। पटना कलम के चित्र लघु चित्रों की श्रेणी में आते हैं। मुगलों के बाद ब्रिटिश काल में पटना कलम का खूब विकास हुआ। उस समय ब्रिटिश, बिहारी संस्कृती से रुबरु होने के लिए स्थानीय कलाकारों से पेन्टिंग बनवाते थे और अपने साथ विदेश लेकर जाते थे। पटना में हांथी दांत की चित्रकारी फली-फूली और काफी विख्यात हुई। लाल चंद्र और गोपाल चंद्र इसके दो प्रसिद्ध चित्रकार थे जिन्हें बनारस के महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह ने अपने यहां जगह दी। पटना में इसके महारथी थे दल्लूलाल। पटना शैली की शबीहें तैयार करने में इनका योगदान उल्लेखनीय है।

पटना कलम की खत्म होती लोकप्रियता

इस चित्र शैली की विशेषता इसका आम जीवन से जुड़ा विषय था। कैमरे के विकास के बाद लोग रोजमर्रा की तस्वीरों के लिए कैमरा का उपयोग करने लगे। और पटना कलम की महत्ता कम होती चली गई। साथ इसके संरक्षण पर भी ध्यान नहीं दिया गया।ब्रिटिश काल के अंत तक यह शैली भी लगभग अंत के करीब पहुंच गई। श्यामलानंद और राधेमोहन प्रसाद इसी शैली के कलाकार थे। राधेमोहन प्रसाद ने ही बाद में पटना आर्ट कॉलेज की नींव रखी थी, जो कई दशकों से देश में कला-गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र है। ईश्वरी प्रसाद वर्मा भारत में पटना कलम शैली के अंतिम चित्रकार थे। करीब डेढ़ दशक पहले उनका देहांत हो गया और उनके साथ ही पटना कलम शैली भी खत्म हो गयी। उनकी पचास से ज्यादा कलाकृतिया आर्ट कॉलेज में देखी जा सकती हैं। पटना कलम के संरक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया गया। जिस कारण अब यह अपवाद बनकर रह गई है।

क्या कहते है जानकार

पटना कला एवं शिल्प महाविद्यालय की प्रोफेसर डा. रीता शर्मा बताती है, कि अंग्रेजों ने पटना कलम में काफी दिलचस्पी दिखाई।ब्रिटिश काल में इसका विकास हुआ और इसने खूब प्रसिद्दि बटोरी। पटना कलम चित्रकला बनाने वाले आम लोग थे तथा इसके विषय भी आम ही होते थे। यह हमारी धरोहर है। इसे संजो कर रखने की जरुरत है। लेकिन इस ओर ध्यान नहीं देने के कारण आज यह सिर्फ किताबों तक सीमित रह गई है।आगे उन्होंने कहा कि “विश्वविद्यालयों में इसकी पढ़ाई होनी चाहिए और बच्चों को इसके बारे में बताना चाहिए। तभी इसे पुनर्जिवित किया जा सकता है।”

यहीं के एक पूर्ववर्ती छात्र रमाकांत ने कहा कि “कॉलेज में कला के इतिहास विषय में पटना कलम के बारे में तो बताया जाता है लेकिन प्रैक्टिकल नहीं होता है। जिस कारण छात्रों का रुझान इस कला की ओर कम होता है। रमाकांत कुछ अपने दोस्तों के मिलकर ‘फोरएवर फाइव आर्ट’ ग्रुप चलाते है जो कला के संरक्षण के कार्य करती है।”

पटना म्यूजियम में है संरक्षित

पटना म्यूजियम के निदेशक डा. विमल तिवारी ने कहा कि “स्थानीय कला के रुप में पटना संग्रहालय में पटना कलम का अच्छा कलेक्शन है। उनके अनुसार संग्रहालय में दो सौ से अधिक पटना कलम की पेन्टिंग संरक्षित है। उन्होंने इसकी खासियत के बारे में बताते हुए कहा कि “इसमें आम लोंगो के चित्र बनाये जाते थे तथा वाटर कलर का उपयोग किया जाता था।”

Follow us on Twitter: thebetterbihar

Follow writer on Twitter: MonuSingh843441

Leave a Reply