मुश्किल हो सकता है, नामुमकिन नहीं

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“लार्ड आई एम फाइव हंड्रेड माइल्स अवे फ्रॉम होम!” पश्चिम का एक प्रचलित गीत है जिसे 1960 के दौरान प्रसिद्धि मिली। ऐसा माना जाता है कि इसे हेडी वेस्ट ने लिखा था। ये एक ऐसे व्यक्ति का गीत है जो घर से मीलों दूर संभवतः एक प्रवासी मजदूर के रूप में फंसा हुआ है। बदन पर कमीज़ नहीं, जेब में पैसे नहीं, और वो घर लौटना चाहता है। ऐसे गाने से शायद पैदल, साइकिल, ऑटोरिक्शा इत्यादि से वापस घर की ओर लौटने की कोशिश कर रहे मजदूरों की याद आ गयी होगी।

महानगर दिल्ली में लॉकडाउन के दौरान भी योगिता पार्क में आवारा कुत्तों को कुछ रोटियां दे जाती थीं। एक दिन जब वो पार्क में पहुंची तो उन्हें एक बारह साल का बच्चा भी दिखा। पूछने पर पता चला कि लॉक-डाउन से पहले उसके माँ-बाप जब घर लौट रहे थे तो उसे किसी रिश्तेदार के पास छोड़ गए थे। बच्चा वहीँ रह रहा था जब परिवार में कुछ विवाद हुआ। झगडे का असर संबंधों पर पड़ा और चाचा के परिवार ने बच्चे को घर से निकाल दिया। अब लॉक-डाउन था, बच्चा दिल्ली में, अपने घर से मीलों दूर था, ना कपड़ों का ठिकाना, ना खाने का। अब शायद समझ आ गया होगा कि “लार्ड आई एम फाइव हंड्रेड माइल्स अवे फ्रॉम होम!” क्यों याद आया।

योगिता कोई राजनैतिक या आर्थिक रूप से बहुत समर्थ लोगों में से नहीं थी। उनकी समझ में नहीं आया कि वो इस बच्चे की मदद कैसे करे, लेकिन उन्होंने अपने मित्रों में इसकी चर्चा की। उनकी ही तरह पशुओं के लिए काम करने वाली स्नेहा को जब इस बच्चे की कहानी पता चली तो उन्होंने इस बच्चे की तकलीफ ट्वीट कर दी। योगिता रोज बच्चे के खाने का इंतजाम तो कर रहीं थीं, और इस बीच पटना से दिल्ली तक ट्रेन चलनी भी शुरू हो चुकी थी। इतने पर बच्चे को उसके माता-पिता से मिलवाया नहीं जा सकता था क्योंकि वो लोग समस्तीपुर में थे और समस्तीपुर से पटना आना मुश्किल था।

अबतक इस ट्वीट पर पटना में पदस्थापित सशस्त्र सीमा बल के इंस्पेक्टर जनरल संजय कुमार की नजर पड़ गयी। उन्होंने परिवार के समस्तीपुर से पटना आने का प्रबंध किया। ट्वीट देखकर ही प्रवासियों की सहायता करने का काम कर रहे इंडिया केयर्स के स्वयंसेवकों ने टिकट का इंतजाम कर दिया। परिवार वापस आया और बच्चा अब अपने परिवार के साथ है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों को साधने और वैमनस्य फैलाने के लिए होता रहा है। दंगे जैसी स्थितियों में पुलिस-प्रशासन भी सबसे पहले इन्टरनेट बंद करवाती है। हम व्यक्तिगत तौर पर गवाही दे सकते हैं कि जब हम लोग मजदूरों के लिए खाना बना रहे होते थे तो लोगों ने प्रवासियों और मजदूरों को खाना खिलाने के लिए हमें पैसे दिए हैं।

बाकी अगर आपको लगता हो कि आपके हाथ में कुछ नहीं, आप समर्थ नहीं हैं तो कम से कम सोशल मीडिया पर समस्या को सामने लाइए। पैसे और पॉवर के होने ना होने से किसी की मदद की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता!

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