दिल्ली दूर है – पलायन करते मजदूरों का सहरसा

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“बैदनाथपुर पेपर मिल… खुलवेबे करबै ना…” गाने की आवाज कान में पड़ी तो हमने उस तरफ झांककर देखा। बीते वर्षों में शहर, या क़स्बा कहिये, पूरी तरह बदल चुका था। हर जगह नए मकान थे, शायद नए लोग भी आ गए होंगे। लम्बे समय के बाद वहां लौटने पर हम रिक्शे से झाँक झाँक कर दायें-बाएं देखते जा रहे थे। गाने वाला नया नहीं था, ये बरसों पहले भी दिखता था। अब कुछ बूढ़ा हो गया था बस, पहले की तरह तगड़ा सा जवान नहीं था, पूरी बांह की उसकी बनियान अब कुछ ढीली सी थी। “क्या गा रहा है ये?” हमने रिक्शेवाले से पूछ लिया। “अरे पागले है सर, कुच्छो गाते रहता है”, उसने पैडल पर जोर लगाते हुए जवाब दिया।

“तो क्या बैद्यनाथपुर का पेपर मिल शुरू नहीं हुआ?” हमने बात को आगे बढ़ाया। ये पूछना भर था कि जैसे किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। अगले कुछ मिनट तक लगातार रिक्शावाला काम ना होने, बच्चों के काम के लिए दिल्ली-पंजाब जाने, अस्पताल की कमी से लेकर बाढ़ के प्रकोप तक पर अपनी तकलीफ सुनाता रहा। हालाँकि बात पच्चीस रुपये पर तय हुई थी, लेकिन उतरने पर रिक्शेवाले ने बीस ही लेने की कोशिश भी की। ये समस्याएं सुनने की वजह से हुआ था या उसने ज्यादा पैसे मांगे थे और पांच रुपये ज्यादा लेने में उसका जमीर जाग गया था, ये कह पाना मुश्किल होगा। गाने वाला काफी पीछे छूट चुका था, बिलकुल वैसे ही जैसे बैद्यनाथपुर के पेपर मिल की कहानी, जो काफी पीछे के दौर में शुरू हुई थी।

अब करीब चालीस-पैंतालिस साल बीत चुके हैं। बिहार में कभी उद्योगों को शुरू करने के लिए निजी क्षेत्र के सहयोग से 1974 में सहरसा में ये पेपर मिल शुरू किया गया था। उस वक्त 48 एकड़ जमीन और 95 लाख रुपये का आबंटन हुआ और प्रतिदिन पांच टन कागज के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया। तीन साल में जब निजी कंपनी से करार ख़त्म हुआ तो 78 में समाजवाद ने इसका अधिग्रहण कर लिया। बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम और बिहार सरकार की सहमती से विदेशी मशीन खरीदी गयी और काम फिर से शुरू करने की कोशिश की गयी। आपको तो पता ही होगा कि सरकारी काम में वक्त लगता है। तो ये सब होते होते 1978 से 1987 आ गया और फिर दो साल में कार्य स्थल को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया।

पैसा नहीं मिलने से फिर से परियोजना ठप्प पड़ गयी और फिर करीब दस साल बाद 1996-97 में बैंक ऑफ़ इंडिया से सात करोड़ चालीस लाख लेकर काम को फिर से शुरू किया गया। ये वो दौर था जब हमने “बैदनाथपुर पेपर मिल… खुलवेबे करबै ना…” वाला गाना पहली बार सुना होगा। सुना है कि 2012 में तत्कालीन उद्योग मंत्री रेणु कुशवाहा ने कहा था कि बैद्यनाथपुर पेपर मिल से धुआं निकलेगा। अब सवाल है कि ऐसा हुआ क्यों नहीं? ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि 1987 में इसकी अनुमानित लागत सात करोड़ बाईस लाख रूपये के लगभग थी, 1991 में ये बढ़कर दस करोड़ बेरसी लाख रूपये के आसपास बताई जाती थी। जब इसे बैंक ऑफ़ इंडिया से पैसे मिले थे उससे थोड़ा पहले 1993-94 में इसे शुरू करने में बारह करोड़ रूपये लगते। इसी वजह से बैंक ऑफ़ इंडिया से पैसे मिलने के बाद भी अस्सी प्रतिशत काम ही हुआ था।

अब आप सोचेंगे कि अगर बिहार में श्रमिक इतने ज्यादा हैं और रोजगार की जरूरत भी है तो फिर भला सरकार फैक्ट्री खोलती क्यों नहीं? इसके लिए हम बिहार के ही केवटी से विधायक फराज फातमी की खबर बताएं जिन्होंने बिहार के गवर्नर को पत्र लिखा। उनका कहना था कि सीएम लॉ कॉलेज पर पहले उर्दू में बोर्ड लगा हुआ था उसे हटा दिया गया है। उर्दू बिहार की दूसरी राजभाषा है इसलिए राज्यपाल महोदय संज्ञान लेते हुए बोर्ड फिर से लगवाने का आदेश दें। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके मतदाताओं ने उनसे पूछना शुरू कर दिया था कि बोर्ड क्यों हटा? इसे फिर से लगवाने के लिए आप क्या कर रहे हैं? सहरसा का नौजवान तो पढ़ाई और नौकरी के लिए पलायन कर गया था, इसलिए उसने अपने विधायक सांसद से पूछा ही नहीं होगा। पलायन कर गया होगा ये हम दावे से इसलिए कह सकते हैं क्योंकि 14 जुलाई 2018 को सहरसा के स्टेशन से टिकट की रिकॉर्ड बिक्री की खबर तो अख़बारों में थी!

बाकी अगर लगे कि बिहार में उद्योग धंधे क्यों नहीं हैं, या ये सोचने लगें कि कॉलेज-विश्वविद्यालयों के लिए बाहर क्यों भागना पड़ता है तो एक बार पास के स्टेशन से दिल्ली-मुंबई और दूसरे बड़े शहरों के लिए हुई टिकट बिक्री का राजस्व मालूम कीजियेगा। पता चलेगा कि जो रोजगार और शिक्षा मांगता, वो तो टिकट लेकर कहीं दूर की दिल्ली के लिए जा भी चुका है!

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