हर आत्महत्या में फर्क है!

0
185

 हम अभिजात्य वर्ग द्वारा सोप ऑपेरा नाम से जाने जाने वाले, आम भाषा के टीवी सीरियल भी नहीं देखते . बालिका वधू की आनंदी को शायद दो-चार बार देखा होगा लेकिन इसकी आत्महत्या की खबर आने से मुझे फर्क पड़ता है .

मुझे इस घटना में आत्महत्या और आत्महत्या का फर्क नजर आता है . हाल की ही एक और आत्महत्या याद आ जाती है, वहां भी पुलिस रिपोर्ट आने से पहले ही अपने अपने हिसाब से हत्या या आत्महत्या तय कर ली गई थी . अपने अपने पूर्वाग्रहों के हिसाब से आत्महत्या सही थी या गलत इसका फैसला भी सुना दिया गया था . वहां मगर “छात्र” मरा था . नतीजे में कई प्रोफाइल फोटो आज भी बदली हुई नजर आती हैं . शायद वो अच्छी आत्महत्या रही होगी . कोई उसे भगोड़ा नहीं कहता, कायरता भरी हरकत भी नहीं . हर सामान्य व्यक्ति के जीवन में दबाव होते हैं, वो झेल नहीं पाया जैसी बातें नहीं हुई .

इस बार मगर एक टीवी कलाकार की मौत हुई है . एक “छात्र” के लिए पूर्वाग्रह अलग होते हैं, एक टीवी या सिने कलाकार के लिए अलग पूर्वाग्रह होंगे . ऊपर से लड़की ! मुझे विश्वास है बुद्धिजीवियों को पहले से ही पता होगा कि वो जैसी परदे पर दिखती थी उतनी बहादुर नहीं थी . इस बार फैसला सुनाने वाले इसे जीवन की समस्याओं से भाग जाना कहेंगे . रिलेशनशिप, वेल सेटल्ड (आर्थिक रूप से) लाइफ, भावनात्मक दबाव नहीं झेल पायी होगी इसलिए ऐसे फैसले पर पहुँच गई जैसी बातें कहेंगे .

कोई नयी बातें नहीं हैं ये . ये सारे आपके असली सवाल भी नहीं है . इस मीठे से अकेलेपन और रिलेशनशिप के सवाल में दरअसल आप ये पूछना चाहते हैं कि घर छोड़कर, किसी छोटे से शहर-कस्बे से निकली लड़की, आखिर एक महानगर तक कैसे पहुँच गई ? आप अवसाद और जीवन के खालीपन की बातें नहीं कर रहे . आप सोच रहे हैं कि पूरे देश के इतने सारे घरों में ये एक प्रिय किरदार क्यों थी ? आपकी असली समस्या है कि ये लिव इन में रहती थी . आपकी समस्या है कि ये साड़ी के अलावा स्कर्ट भी क्यों पहन लेती थी ? आपकी असली समस्या है कि आप मानते हैं सिगरेट पीना तो पुरुषों का काम है ! एक ख़ास अभिजात्य वर्ग की बपौती है ! आपको ये जानना है की कहीं एक छोटे शहर से आई मामूली सी लड़की सिगरेट तो नहीं पीती थी ?

अगर इस मौत ने आपकी संवेदनाओं को झकझोरने के बदले आपको सवाल उठाने ला खड़ा किया है, तो आपको पुरानी फिल्मों के गाने जरूर सुनने चाहिए . एक इंदीवर की लिखी कविता, मुकेश ने 1974 की फिल्म अनजान राहें में गाई थी :

“मैं राम नहीं हूँ फिर क्यूं उम्मीद करूँ सीता की

कोई इन्सानों में ढूँढे क्यों पावनता गंगा की

दुनिया में फ़रिश्ता कोई नहीं, इन्सान ही बनके रहना

मुझे नहीं पूछनी …

टीवी के चरित्र को असल जिंदगी में नहीं जी पायी कहने से पहले जरूर याद कर लीजियेगा कि प्रत्युषा चौबीस साल की लड़की थी . ये भी याद कर लीजियेगा कि जैसे दबाव “छात्र” पर थे उस से थोड़े ज्यादा ही प्रत्युषा पर रहे होंगे .बाकी अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद की तरह अच्छी आत्महत्या और बुरी आत्महत्या का अंतर करने बैठे हैं तो और बात है . मौतों में आपका जाति, धर्म, सम्प्रदाय और अब स्त्री या पुरुष होना ढूंढना किसी के लिए नयी बात नहीं रही .

Leave a Reply