19 वर्षीय पवन अपने फिल्मों से दे रहे संदेश

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मोनू कुमार, पटना: अगर इरादे नेक और मजबूत हौसला हो तो कम उम्र में भी बड़ा काम किया जा सकता है। यह सिद्ध किया है पटना के 19 वर्षीय पवन राज ने। पवन पिछले छः वर्षों से विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर शार्ट फिल्में बनाते आ रहे हैं। उनकी दो फिल्में अंतर्राष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव में भी दिखाई जा चुकी है।

फिल्म बनाने की शुरुआत

“द बेटर बिहार” से बात करते हुए पवन ने बताया कि उन्होंने अपनी पहली शॉर्ट फिल्म वर्ष 2014 में बनाई थी। उन्होंने कहा कि, “मैंने पहली बार फिल्म यूनिसेफ द्वारा आयोजित एक वर्कशॉप के बाद बनाई थी। उस वक्त मैंने दो फिल्में बनाई थी – एक बाल मजदूरी पर थी और दूसरी भिक्षावृति पर।” उसके बाद से वे कभी रूके नहीं और अभी तक उन्होंने कुल 11 फिल्में बनाई है। उनकी फिल्में मुख्य रूप से बच्चों और स्वच्छता पर आधारित होती है।

इंटरनेशनल चिल्ड्रेन फिल्म फेस्टिवल

कचड़ा बीनने वालों पर पवन द्वारा बनाई गई फिल्म “मैं भी इंसान हूं” हैदराबाद में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव 2015 में चली थी। इसके बाद 2017 में स्वच्छ भारत अभियान पर उनकी फिल्म “पहल” बाल फिल्म महोत्सव, लखनऊ में दिखाई गई थी।

प्रेरणा स्रोत

वर्तमान में गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे पवन ने कहा कि, “हमारे आसपास कई वंचित लोग हैं जो अपने मूलभूत अधिकारों से अनभिज्ञ हैं। इनकी कोई नहीं सुनता। कैमरे के माध्यम से इन मुद्दों को उठाना मुझे अच्छा लगता है और इसलिए मैं फिल्में बनाता हूं।”

अन्य कार्य

पवन ने बॉडी लैंग्वेज पर एक रिसर्च पेपर लिखा है। इसका नाम है “बॉडी लैंग्वेज एंड इट्स अंडरस्टेंडिंग”। यह एकेडमिया पर उपलब्ध है। इसे 95 देशों के लोग अभी तक पढ़ चुके है। इसके अलावा पवन फोटोग्राफी के भी शौकीन है। बच्चों से जुड़े विषयों पर अच्छा कार्य कर सके इसके लिए उन्होंने  पिछले साल जून में “चाइल्ड राइट्स सेंटर, पटना” में फंक्शनल एक्सपोज़र इंटर्नशिप किया था। बिहार बाल भवन “किलकारी” द्वारा प्रकाशित ‘केव्स ऑफ बिहार’ पुस्तक में उनकी खींची हुई तस्वीरें और लेखों को शामिल किया गया है।

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