समय की आवश्‍यकता : एक राष्‍ट्र एक चुनाव

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अर्जुन राम मेघवाल

भारत एक विशाल लोकतांत्रिक राष्‍ट्र है जिसका ओजस्‍वीपूर्ण और सुदृढ संविधान है, जो अपने नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करता है। ‘’हम भारत के लोग’’ की भावना ने नियमित रूप से हमारी संस्‍थाओं को मजबूत किया है और प्रौद्योगिकी और ज्ञान प्रबलता की 21वीं शताब्‍दी की चुनौतियों को पूरा करने हेतु उनके प्रमुख मूल्‍यों का निर्माण किया है तथा प्रतिस्‍पर्धी विश्‍व में निरन्‍तर प्रमुखता प्रदान की है। वर्ष 2014 में, तीन दशकों से भी अधिक समय के बाद भारत में पूर्ण बहुमत के साथ स्थिर सरकार आयी, क्‍योंकि जनता ने नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में एनडीए (राष्‍ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) की सरकार के लिए अपना जनादेश किया। तब से ‘’जन धन आधार मोबाइल ट्रिनिटी,’’ डीबीटी, जीएसटी, ओआरओपी, डिजीटल इंडिया, स्‍वच्‍छ भारत मिशन आदि जैसे बहुत से सा‍हसिक सुधार के उपाय किये गये हैं, रक्षा उपकरणों के स्‍वदेशी निर्माण को बढावा देकर और राफेल को शामिल करके रक्षा क्षेत्र को मजबूत किया गया है, त‍था साथ ही कृषि संबंधी एवं श्रम सुधार भी किये गये हैं। कोविड-19 महामारी के इस चुनौतीपूर्ण समय में प्रधानमंत्री द्वारा आत्‍मनिर्भर भारत के आह्वान की भारत के विकास पथ में अहम भूमिका होगी, तथापि वैश्विक महाशक्ति (सुपर पावर) बनने की यात्रा में अभी काफी दूरी तय करना बाकी है। एक प्रमुख कदम जो इन लक्ष्‍यों को हासिल करने में विकास परिदृश्‍य को बहुत अधिक उत्‍प्रेरित करेगा, वह देश में एक साथ चुनाव करके चुनाव की अवधि का पुर्नगठन है।


संविधान के भाग–XV के अनुच्‍छेद 324 से 329 में यह उपबंध किया गया है कि संसद, राज्‍य विधान सभा के लिए सभी चुनावों की जिम्‍मेदारी, निदेशन, नियंत्रण और आयोजित करने की शक्ति भारतीय निर्वाचन आयोग पर होगी तथा अन्‍य उपबंध चुनाव कार्य से संबंधित हैं। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कराना सुसाध्‍य बनाने के लिए संसद में जनप्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1950 और जनप्रतिनिधित्‍व अधिनियम, 1951 और उनके अंतर्गत बनाये गये कानूनों अर्थात् मतदाता नियमावली, 1960 का पंजीकरण तथा चुनाव नियमावली, 1961 का संचालन अधिनियमित किया है। स्‍थानीय निकायों (पंचायती राज संस्‍थाओं, निगमों/नगरपालिकाओं आदि) के चुनाव की जिम्‍मेदारी संबंधित राज्‍य निर्वाचन आयोग की होती है। प्रत्‍येक स्‍तर पर अभिशासन के लिए इस संवैधानिक व्‍यवस्‍था में चुनाव कार्यक्रम पूरे वर्ष सक्रिय चलता है। चुनावों के चलते आदर्श आचार संहिता विकास परियोजनाओं तथा जरूरतमंद लोगों के लिए बनायी गयी जनकल्‍याण की स्‍कीमों को कार्यान्वित करने से रोकती है। चुंकि प्रशा‍सनिक तंत्र चुनाव संबंधी कार्यों में लगा रहता है और अत्‍याधिक कार्यभार से दबा रहता है, नीतिगत पक्षाघात के कारण सरकार की नीतियां उपेक्षित हो जाती है। अलग-अलग चुनाव होने से भारतीय निर्वाचन आयोग और राजनीतिक पार्टियों, दोनों के लिए अत्‍याधिक व्‍यय होता है। महत्‍वपूर्ण मानव संसाधन अर्थात् पुलिस प्रशासन, अर्धसैनिक और अन्‍य सुरक्षाबल चुनाव प्रक्रिया में लगे रहते हैं जो कानून व्‍यवस्‍था बनाये रखने संबंधी नियमित नियंत्रण को कमजोर बना देता है, और आम जनता के लिए अपनी शिकायतों का समाधान करना मुश्किल हो जाता है।
1967 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे। उसके बाद, उनके चुनावी कार्यक्रम अलग-अलग हो गए। संविधान के अनुच्छेद 356 के अविवेकपूर्ण और पक्षपातपूर्ण उपयोग के कारण भी इस चक्र का विघटन हुआ। गठबंधन सरकारों के कारण अब तक सात लोकसभा समय से पहले भंग हुई।


15 जून 1949 को संविधान सभा की बहस के दौरान, प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने चुनावी चक्र को ठीक करने के बारे में कहा , “हमारे संविधान में संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह नियत चार साल की एक निश्चित अवधि का प्रावधान नहीं है … हर समय कहीं न कहीं कोई चुनाव या और कुछ होता रहेगा। शुरुआत में या बहुत पहले 5 या 10 वर्षों में ऐसा नहीं होगा, लेकिन 10 या 12 साल बाद, हर पल, किसी न किसी प्रांत में चुनाव हो रहा होगा। “


1983 में चुनाव आयोग की पहली वार्षिक रिपोर्ट में पहली बार एक साथ चुनावी विचार को प्रस्तुत किया गया था, तब से ही इसके लिए कई बार मांग की जा चुकी है। भारत के विधि आयोग ने चुनाव कानूनों के सुधार पर अपनी 170 वीं रिपोर्ट (1999) में शासन में स्थिरता के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दिया है। कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने दिसंबर 2015 में ‘हाउस ऑफ पीपुल (लोकसभा) और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित करने की व्यवहार्यता’ पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। 2017 में बजट सत्र से पहले संसद के संयुक्त सत्र के लिए अपने परंपरागत संबोधन में और कई अन्य अवसरों पर, पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी ने भी इस मुद्दे पर रचनात्मक बहस करने का आह्वान किया था। अगस्त 2018 में 17 वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव से पहले, भारत के विधि आयोग ने एक साथ चुनाव आयोजित करने से संबंधित कानूनी और संवैधानिक प्रश्नों की जांच करते हुए एक साथ चुनावों पर अपनी मसौदा रिपोर्ट जारी की थी। 19 जून 2019 को, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर चर्चा के लिए लोक सभा या राज्य सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले सभी राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों की एक बैठक आयोजित की थी। हाल ही में, संविधान दिवस 2020 के अवसर पर, केवड़िया गुजरात में 80 वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए, भी उन्होंने प्रभावी ढंग से शासन के विभिन्न स्तरों के लिए एकल मतदाता सूची और एक साथ चुनावों पर ज़ोर दिया।


‘एक राष्ट्र- एक चुनाव’ को लागू करने के लिए चुनाव को एक ही समय में साथ-साथ करने के लिए कई सिफारिशें की गई हैं। सभी चुनावों के लिए एक एकल एकीकृत मतदाता सूची को इस दिशा में एक प्रारंभिक कदम माना जा सकता है। एक साथ चुनावों के लिए कई राज्यों में चुनाव कार्यक्रम को स्थगित करने और कुछ अन्य राज्यों की विधानसभाओं को पहले भंग करने की आवश्यकता होगी। लोकसभा चुनाव से पहले और तुरंत बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम उपयुक्त संवैधानिक उपायों और वांछित राजनीतिक आम सहमति के माध्यम से एक साथ किया जा सकता है। शेष राज्यों के चुनाव के लिए विधानसभा का कार्यकाल और कार्यक्रम संवैधानिक रूप से समायोजित किया जा सकता है ताकि अगले लोकसभा चुनाव का सभी राज्यों के चुनावों के साथ पूरी तरह से ताल-मेल बिठाया जा सके। मौजूदा ‘अविश्वास प्रस्ताव’ में ‘उचित रूप से अविश्वास की अभिव्यक्ति’ के लिए रचनात्मक मतदान का रास्ता अपनाने के लिए संशोधन किया जा सकता है जो कि वैकल्पिक सरकार में विश्वास होने पर ही सरकार को हटाना सुनिश्चित करता है। लोक सभा / राज्य विधानसभा कार्यकाल के दौरान, अविश्वास की अभिव्यक्ति के ऐसे रचनात्मक मत ’की संख्या सीमित की जा सकती है। त्रिशंकु सदन / विधानसभा की स्थिति से सरकार बनाने हेतु चुनाव पूर्व अथवा चुनाव के बाद गठबंधनों के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से अकेले सबसे बड़े राजनीतिक दल का विकल्प प्रदान करके निपटा जा सकता है। सरकार बनाने में असफल होने पर, मध्यावधि चुनाव केवल शेष कार्यकाल के लिए हो सकता है, न कि पूरे पांच साल की अवधि के लिए। राजनीतिक दलों को भी मौजूदा खामियों को दूर करने के लिए दलबदल विरोधी कानूनों पर पुनर्विचार करने के लिए एकमत होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र के लिए अन्य लोकतांत्रिक देशों, जहां संघीय एवं प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते हैं, के उदाहरण को भी देखा जा सकता है, और उसी अनुरूप अपने यहां भी संशोधन किये जा सकते हैं। स्वीडन में मतदान की निश्चित तारीखें, यूके की ‘फिक्स्ड-टर्म पार्लियामेंट एक्ट’, 2011’, संयुक्त राज्य अमेरिका में कई पदों के लिए कॉमन बैलेट पेपर, दक्षिण अफ्रीका की राष्ट्रीय / प्रांतीय विधानमंडल और नगरपालिका चुनाव के लिए क्रमशः 5 साल और दो साल की निश्चित अवधि प्रणाली। वन-नेशन वन इलेक्शन से भारत के सामूहिक विकास में तेज़ी आएगी। इससे धन शक्ति पर नियंत्रण लगेगा और सार्वजनिक धन की बचत होगी। सरकार की नीतियों और विकासात्मक कार्यक्रमों का समय पर कार्यान्वयन, प्रशासनिक व्‍यवस्‍था पर बोझ कम होना, आवश्यक सेवाओं की निरंतर प्रदायगी से न केवल नागरिकों को लाभ होगा, बल्कि सरकार को चुनाव मोड से बाहर आने और नागरिकों के जीवन में सुधार लाने और उनकी आकांक्षा को पूरा करने हेतु निर्णय लेने और योजनाओं को लागू करने के लिए और अधिक मदद मिलेगी। इस सुधार उपाय में अंतर्निहित फायदे होंगे, जिनमें भारतीय चुनाव आयोग द्वारा चुनावों की लागत को कम करना और राजनीतिक दलों द्वारा कम खर्च करना शामिल है। चीजों की ऐसी संगठित और समन्वित योजना में, व्यापकता और जागरूकता के लिए एक पूर्व और बाद के विधान प्रभाव आकलन ढांचे का प्रस्ताव किया जा सकता है, जिसमें एक व्यापक जागरूकता और सामान्य मानवी पर विधायी आकलन के प्रभाव के सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और प्रशासनिक परिणाम को शामिल किया जा सकता है । अतीत में कई चुनावी सुधार किए गए थे, जिनके परिणामस्वरूप राष्ट्र ने अपनी लोकतांत्रिक संस्था पर गर्व किया है। यदि प्रस्तावित चुनाव सुधार उपायों पर विचार किया जाता है और नागरिकों से इसकी स्‍वीकृति ली जाती है, तो यह राष्ट्रीय विकास और विकास योजना को गति प्रदान करेगा और हमारे लोकतंत्र को और मजबूती मिलेगी।


चूंकि राष्ट्र एक वैश्विक महाशक्ति और 21 वीं सदी का अग्रणी देश बनने के लिए अग्रसर हो रहा है, मेरा मानना ​​है कि वन नेशन-वन इलेक्शन का चुनाव सुधार समय की आवश्यकता है। मैं राजनीतिक दलों के नेताओं और एक गौरवमयी, जीवंत लोकतंत्र के सभी पक्षों से सामूहिक रूप से सोचने, चर्चा करने, बहस करने और सबसे महत्वपूर्ण सुधार उपाय लागू करने का मार्ग प्रशस्त करने की अपील करता हूं। यह भारतीय समाज के व्यापक कल्याणकारी लक्ष्य के लिए हमारी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों से संबंधित आत्मनिरीक्षण का समय है।

लेखक अर्जुन राम मेघवाल भारत सरकार में संसदीय कार्य और भारी उद्योग एवं लोक उद्यम राज्यमंत्री हैं।

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