महाराष्ट्र की पानी बाई

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साभार इंडिया टाइम्स

महाराष्ट्र के लातूर की तस्वीरें अभी याद ही होंगी . पानी की कमी से जूझते महाराष्ट्र के इस इलाके के लिए रेल मंत्री का पानी से भरी ट्रेनें भेजने का फैसला भी काफ़ी चर्चित हुआ है . महाराष्ट्र भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य होता है . अगर 2014 के आंकड़ों के हिसाब से देखेंगे तो महाराष्ट्र में 19,000 गाँव में पानी की कोई व्यवस्था नहीं .

जी हाँ, उन्नीस हज़ार गाँव, और अगर एक गाँव में सौ परिवारों के औसत से भी जोड़ेंगे तो आपको अंदाजा हो जायेगा कि पानी की कमी से कितने लोग जूझ रहे हैं . इस साल फिर से मानसून के कम होने की संभावना जताई जा रही है . हाल के सालों यानी 2013 से सूखा झेलते ऐसे इलाकों में क्या होता होगा इसका अंदाजा है ? क्या करते होंगे लोग वहां पानी के लिए ?

महाराष्ट्र में कई जगह पानी के लिए लोग शादी करते हैं . जी हाँ बिलकुल सही पढ़ा है, पानी के लिए शादी की जाती है . कई स्त्रियाँ जो परित्यक्ता हैं या विधवा हैं उनके पास जीवनयापन के बहुत ज्यादा विकल्प नहीं होते . वहीँ पुरुषों के लिए भी घर में पानी लाने वाला कोई तो चाहिए ही . घर पानी के बिना तो नहीं चल सकता . ऐसे में पानी के लिए शादियाँ की जाती हैं . ऐसी स्त्रियों को ‘पानी बाई’ कहा जाता है . इन्टरनेट पर अगर Water wives ढूंढ लें तो मिल जायेगा .

भारत में हिन्दुओं के लिए एक से ज्यादा विवाह गैरकानूनी है . इसका मतलब ये कतई नहीं कि ऐसा नहीं होता . एक से ज्यादा शादी की अनेक वजहें हो सकती हैं . लेकिन पहली बीवी, बीवी हो, और फिर दो-तीन शादियाँ सिर्फ इसलिए की जाएँ क्योंकि पानी लाने के लिए कोई चाहिए, और स्त्रियों को भी आर्थिक सहारा चाहिए ये तो अति ही है !

ये परंपरा भी कोई आज की नहीं है . सालों से इस इलाके के लोग ऐसा करते रहे हैं . पहली पत्नी, सचमुच वाली पत्नी होती है . मतलब एक पत्नी के जो भी अधिकार होते हैं, वो होंगे उसके पास . बाद की पत्नियाँ पानी के लिए की गई शादियाँ होती है . जैसा की आम तौर पर होता है, गरीब किसानों की लाचारी का ये रूप आपको तथाकथित नारीवादी दिखाने नहीं आयेंगे . वो सूखा पड़ने पर लाचार हो चुके किसान की आत्महत्या तक इंतज़ार करते हैं .

उसके बाद वो ‘कलावती’ के घर जायेंगे . तस्वीरें खिंचवायेंगे, फिर अपनी ही सरकार के खिलाफ विरोध का स्वर बुलंद करेंगे . लेकिन मेरा उनमें कुछ ख़ास interest नहीं है . लाशें नोच नोच कर खाना तो गिद्धों की आजीविका है, वो तो करेंगे ही ! मेरा सवाल आपसे है, खुद से है . हम भारत के लोग क्या कर रहे थे जब ऐसा होता रहा ? हम आगे क्या करेंगे पानी की कमी का ये रूप देखने के बाद ?

हम पानी बचाने की कोई कोशिश करते हैं ? क्या शेव करते वक्त पानी बंद करके पानी बचाया था हमने ? क्या घर में टप-टप चूते किसी नलके से पानी की बर्बादी रोकने की कोशिश की है ? कार-बाइक धोने में बर्बाद हुआ पानी बचाने की कोशिश की ? छोटे से छोटा प्रयास भी मायने रखता है . कल को आपका इलाका लातूर हो जाए इस से पहले ही अपने इलाके में प्रयास शुरू कीजिये .

बाकी नारेबाज़ी और बयानवीर होने के लिए देश के पास कई गिद्ध हैं, किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए हम बिना मीडिया के शोर और कैमरों की चमक के अपना प्रयास तो कर ही सकते हैं . 

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