शनिवार को बिहार के पटना जिले में मोकामा-बेगूसराय सीमा पर बरौनी थर्मल पावर के नए ऐश डाइक के निर्माण के लिए बाउंड्री वाल का काम स्थानीय प्रशासन के निर्देश के बाद किया जा रहा था। इस दौरान वहां असमाजिक तत्वों ने स्थानीय लोगों की आड़ में जमकर हंगामा किया और तोड़फोड़ की।

इस दौरान वहां सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट भी की गई। दरअसल, बरौनी थर्मल के एस डाइक के लिए थर्मल से 5 किलोमीटर दूर कसहा बरियाही में सैकड़ों किसानों की 290 एकड़ जमीन सरकार ने काफी समय पहले अधिगृहीत कर ली थी। जब वहां कोई निर्माण नहीं हो रहा था तब वहां स्थानीय लोगों ने खेती करनी शुरू कर दी थी। बिहार सरकार ने जब एनटीपीसी को यह प्लांट हस्तांतरित किया था तब उन्होंने लिखित में यह बताया था कि ऐश डाइक के लिए अधिगृहीत जमीन पर कोई विवाद नहीं है और यह पूर्णतया सरकारी है।

इस संबंध में एनटीपीसी के जीएम मुनीश जौहरी ने बताया कि विद्युत उत्पादन के लिए राख निष्पादन के लिए एस पाउंड बनाना जरूरी है। उन्होने कहा कि 290 एकड़ सरकारी जमीन का अधिग्रहण किया गया था, इस पर 27 मई से काम शुरू किया गया था, शनिवार को काम के दौरान अचानक करीब 500 की संख्या में असामाजिक तत्व निर्माण स्थल पर पहुंचे और काम बंद करवाकर पत्थरबाजी करने लगे। इस दौरान कई मशीनें क्षतिग्रस्त हो गई और कई पुलिसकर्मी और निर्माण कार्य में लगे लोग घायल हो गए। उनका कहना है, किसानों का विरोध गलत है जिस जमीन पर एस पाउंड बनाना है वह सरकारी जमीन है।

यह धटना एक साथ कई सवाल खड़े करती है। आखिर बिहार में हर बार ऐसा क्यों होता है। एक संस्थान जिसे सरकार ने पावर प्लांट हस्तांतरित किया था और लिखित में बताया था कि इसके लिए अधिगृहीत जमीन विवाद रहित है तब उस पर इस तरह का विवाद होना कहीं से समझ से परे है। सरकार के निर्देश के बाद भी उसे अपने ही प्रोजेक्ट को सुचारू रूप से चलाने के लिए लोगों का विरोध झेलना पड़ रहा है। साथ ही उसकी सहायता को पहुंचे प्रशासन को भी विरोध झेलना पड़ रहा है। यह सब तब हो रहा है जब केंद्र आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है और बिहार में सत्तासीन सरकार के मुखिया नीतीश कुमार दो दिन पहले ही देश-दुनिया के उद्योगों से अपील कर चुके हैं कि वे बिहार आएं और यहां निवेश करें। हम यहां उन्हें सारी सुविधा मुहैया करवाएंगे।

आखिर यह सब होगा कैसे जब केंद्र सरकार के उपक्रम एनटीपीसी जैसी संस्था को बिहार सरकार द्वारा दिए गए पावर प्लांट को चलाने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है। दरअसल इसके पीछे की मानसिकता हमें समझनी होगी। एक तरफ सरकार नीतियां बना तो देती है पर जमीन पर उसे लागू करवाने के लिए जितने जरूरी कदम उठाने चाहिए वो उठाने में कहीं न कहीं चूक जाती है और इसका लाभ लेने के लिए राजनीति शुरू हो जाती है। आज यह विरोध कहीं न कहीं राजनीति से प्रेरित ही है। नहीं तो विरोध करने वाले किसानों को अपना काम-धंधा छोड़कर हिंसक बनने की सुध ही कहां है। उन्हें तो बस राजनीति करने वालों ने अपना हथियार बनाकर आगे कर दिया है और सरकार बेबस बनकर मूक दर्शक बनी हुई है।

आज जरूरत इस बात की है जब सरकार बिहार में नए-नए उद्योगों को आमंत्रित कर रही है और उन्हें सारी सुविधाएं देने की बात कर रही है तो उन्हें एनटीपीसी जैसे उपक्रमों को सहायता देनी ही होगी ताकि वे अपना काम सुचारू रूप से कर बिहार को पर्याप्त बिजली दे सके जिसका इस्तेमाल बिहार सरकार विकास के नए आयाम स्थापित करने में कर सके। एनटीपीसी जैसे उपक्रमों की सफलता ही दूसरे उद्यमों को यहां आने के लिए आकर्षित करेगी और सरकार के सकारात्मक और कठोर कदम उनकी राह आसान कर सकेगी।

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