पहल: पारदर्शी कराधन-ईमानदारों का सम्मान

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ईममानदार करदाताओं में भरोसा पैदा करेगी यह व्यवस्था

-(अजय कुमार,वरिष्ठ पत्रकार)

     कोरोना की चुनौतियों के बीच अलग-अलग समूहों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने समय-समय पर पहल की है।  इस बार की यह पहल देश के टैक्सपेयर्स के लिए की गयी है। ईमानदारी से टैक्स अदा करने वाले लोगों की शिकायत लंबे समय से रही है कि वे अपना टैक्स तो चुकता कर देते हैं, पर उन्हें बदले में परेशानी के सिवा कुछ नहीं मिलती। कहने की जरूरत नहीं है कि औपनिवेशिक काल की संरचना पर आाधारित टैक्स प्रणाली लागू रही है। हालांकि कतिपय बदलावों के साथ टैक्स पेयर्स के लिए सुगम बनाने के प्रयास भी होते रहे हैं। लेकिन इन प्रयासों को नयी सूरत देने की कोशिश अब जाकर प्रधानमंत्री मोदी ने की है। उन्होंने स्लोगन दिया है- पारदर्शी कराधन-ईमानदारों का सम्मान। यह व्यवस्था कर प्रणाली को पारदर्शी बनाने के अलावा टैक्सपेयर्स को सशक्त करेगी। इसका ध्येय यही है कि टैक्स देने वाले लोगों को हर स्तर पर सहूलियत मिले।

         आज ऑनलाइन पद्धति को अपनाने पर खास जोर है,ऐसे में टैक्स के ऑनलाइन भुगतान के लिए पेमेंट गेट-वे को सुगम बनाने की दिशा में कदम उठाये जाएंगे। सबसे अहम बात यह है कि इसके तहत टैक्सपेयर्स के दस्तावेजों की पहचान संख्या को केंद्र में रखा गया है ताकि किसी भी विवाद के वक्त उसे निबटाने में इस पहचान संख्या का इस्तेमाल किया जा सके। आमतौर पर सरकारी कामकाज में देखा जाता है कि दस्तेवेजों से जुड़ी तमाम जानकारियों को सहेज कर रखने की जवाबदेही उन्हीं लोगों पर होती है जो सरकार के खजाने को भरने में एक हिस्सेदार की भूमिका निबाहते हैं। इससे माना जा रहा है कि सरकार टैक्स भुगतान की व्यवस्स्था को इस प्रकार से सरल बनाना चाहती है जैसे कोई नागरिक घर बैठे बिजली का बिल जमा कर देता है या ट्रेन का टिकट कटा लेता है।

        इस प्रणाली का केंद्रीय तत्व ट्रांसपेरेंट ट्रांजेक्क्शन (पारदर्शी भुगतान) है।  टैक्स प्रणाली की दिशा में इसे बड़े सुधार के बतौर देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी है कि यह प्लेटफॉर्म फेसलेस असेसमेंट,फेसलेस अपील को बढ़ावा देगी। यानी ऐसी व्यवस्स्था विकसित की जा रही है जो करदाताओं के लिए मुसीबत की जगह सुविधाजनक हो। फेसलेस अपील की सुविधा पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के मौके पर 25 सितंबर से उपलब्ब्ध होगी।

         केंद्र सरकार की समझ रही है कि देश के विकास में ईमानदार करदाताओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। टैक्स प्रणाली में सुधार की कवायद को विवाद से विश्वास योजना की कड़ी के रूप में देखने की जरूरत है। आमतौर पर कोर्ट या न्यायाधीकरण में टैक्स से जुड़े विवाद सालों चलते रहते हैं। उसका समाधान निकलने में वर्षों लग जाते हैं और करदाता हतोत्साहित होते हैं। इसका नुकसान राजस्व की प्राप्ति में तो होता ही है, आम करदाता कर अदायगी की पूरी प्रणाली को ‘झमेला’ समझने लगता है। इस तरह दोहरी मार पड़ती है। संभवत: इन्हीं वास्तविकताओं को समझते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने नयी व्यवस्था को सीमलेस, पेनलेस और फेसलेस कहा है ताकि कर प्रणली की ढांचागत दिक्कतों को दूर किया जा सके।

        यह देखा जाता है कि किसी व्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाने से उसमें लोगों की सहभागिता बढ़ने लगती है। इसे इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि वर्ष 2014-15 की तुलना में वर्ष 18-19 में टैक्सपेयर्स की संख्या में करीब पौने तीन  करोड़ का इजाफा हो गया। इस वृद्धि की वजह टैक्स प्रणाली को सरल व पारदर्शी बनाना है। बेशक करदाताओं की संख्या में इजाफा टैक्स संरचना में सुधार का परिणाम कहा जा सकता है। इसी कड़ी में यह तथ्य है कि वर्ष 14-15 में करदाताओं की संख्या 5. 70 करोड़ थी। वर्ष 18-19 में यह बढ़कर 8.74 करोड़ हो गयी। सरकार को उम्मीद है कि पारदर्शी कराधन-ईमानदारों का सम्मान योजना से आनेवाले दिनों में करदाताओं की संख्या और बढ़ेगी। इस बात पर भी गौर करने की जरूरत है कि पीएम मोदी ने सत्ता में आने के बाद आयकरदाताओं के मामले को देश के समाने बहस के केंद्र में लाया। उन्होंने हर मंच पर यह बात उठायी कि देश से इतने करोड़ लोग विदेशों में घूमने जाते हैं, इतने करोड़ लोग ऐसे हैं जो महंगी गाड़ियां खरीदते हैं। आबादी का एक बड़ा हिस्सा भौतिक सुख-सुविधाओं का आनंद लेता है। पर जहां टैक्स देने की बात होती है, तो यह संख्या कुछ करोड़ में सिमट जाती है। यह विरोधाभास बताता है कि देश में एक वर्ग ऐसा है जो अब भी टैक्स देना नहीं चाहता। एक अरब 30 करोड़ की आबादी वाले मुल्क में आठ या नौ करोड़ टैक्सपेयर का होना बड़ी संख्या नहीं है। जाहिर है कि जो लोग टैक्स नहीं देना चाहते, उन्हें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। टैक्स देनेवाले लोग जब देखते हैं कि सक्षम लोग टैक्स नहीं दे रहे हैं,तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। टैक्स प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाना एक बात है और टैक्स अदा करना दूसरी बात। हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में यह मानसिकता कायम है कि सरकार से सभी प्रकार की सहूलियतें लो और जब देने की बारी आती है, तो वे मुंह चुराने लगते हैं। दरअसल, अब समय आ गया है कि टैक्स न देने की मानसिकता बदली जाये। इसे बोझ की जगह देश के प्रति अपनी जवाबदेही समझनी होगी। टैक्स संबंधी नियमों में बदलाव कर उसे सरल व पारदर्शी बनाने का उद्देश्य भी यही है कि आयकर के दायरे में धन अर्जित करने वाले लोग इसमें अपनी सहभागिता निभाएं।

         किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्स्था में सरकारों की इस बात के लिए भी आलोचना होती है कि टैक्स देनेवाले लोगों को ही अपनी ईमानदारी का सर्टिफिकेट भी देना पड़ता है। इस लिहाज से देखें, तो प्रधानमंत्री मोदी का नजरिया बिल्कुल साफ रहा है और यही बात करदाताओं में भरोसा पैदा करती है। समय-समय पर टैक्स प्रणाली में सुधार और करदाताओं के साथ खड़े होने की भावना उनमें विश्वास पैदा करेगी। करदाताओं को देश के विकास में बड़ी भूमिका निभानेवाला बताने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उनके रोजमर्रे के जीवन में आनेवाली कानूनी पेचों को किस हद तक सरल बनाया जाता है। ईमानदार करदाताओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी की पहल से निश्चित रूप से राहत मिलेगी।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं )

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