एक बीता हुआ शहर – डालमियानगर

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मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था
के वो रोक लेगी मना लेगी मुझको…

कैफ़ी आज़मी ने ये गजल लिखी, या मो. रफ़ी ने गाई तो मुहब्बत के बारे में है, मगर ये नौकरियों पर भी लागू हो जाती है। व्यक्तिगत अनुभव और पढ़े हुए के आधार पर हम ये मानते हैं कि नौकरी छोड़ने और नौकरी छूट जाने में जमीन आसमान का अंतर होता है। नौकरी छोड़ रहा व्यक्ति गुस्से में होता है, वो ज्यादा सोच ही नहीं सकता। जिसकी नौकरी छूटने वाली हो, कंपनी में छंटनी या किसी और वजह से उसे निकाला जा रहा हो, उसकी हालत बिलकुल अलग होती है।

जैसे हिन्दी फिल्मों में भेष बदले हुए नायक को सारे दर्शक पहचान रहे होते हैं, बस खलनायक जिसके अड्डे पर नायक होता है, वही नहीं पहचान पाता, कुछ वैसा ही होता है। उस दफ्तर/फैक्ट्री में काम कर रहे करीब-करीब हरेक व्यक्ति को पता होता है कि इसे निकाला जा रहा है, बस उसी को समझ में नहीं आ रहा होता। वो सभी से, रोज जैसा ही, बातचीत का प्रयास करता है, और लोग कन्नी काट रहे होते हैं। जब निकाले जाने का आदेश मिल भी जाता है तो भी उसे लगता है शायद ऊपर के लोगों से नाम भेजने में कुछ गलती हो गयी होगी। वो अच्छा कर्मचारी है, ईमानदारी से काम करता है, उसे भला क्यों निकालेंगे?

नौकरी जा चुकी है, ये उसे पूरी तरह तब समझ में आता है जब वो आखिरकार दरवाजे से बाहर आ जाता है। अगले महीने के खर्चे, बच्चों की फीस, पत्नी की कोई फरमाइश, और ऐसी ही दर्जनों चीज़ों के लिए उसके पास पैसे नहीं होंगे, ये उसे फ़ौरन समझ में नहीं आता। सबसे पहली चीज़ होती है पद के साथ जुड़ी प्रतिष्ठा। कल तक वो बताता था कि वो ये काम करता है, उसका पेशा उसके परिचय का हिस्सा था, अब वो उसके पास नहीं होगा, सबसे पहले ये कचोटना शुरू करता है। वो पहचान वालों से मुंह छुपा कर चुपके से निकल जाना चाहता है। लोगों को उसकी तरफ देखने की फुर्सत नहीं, लेकिन उसे लगता है सब पीठ पीछे उसकी तरफ इशारे कर रहे होंगे।

ये महसूस करना भयावह होता है। अब सोचिये कि अगर एक साथ बारह हज़ार से अधिक लोगों के साथ ऐसा हो जाए तो कैसा होगा? जुलाई 1984 में एक दिन ऐसा ही हुआ। बिहार के रोहतास जिले में स्थित, रोहतास ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज बंद हो गयी थी। इस समूह के अलग अलग हिस्सों में कई चीज़ों का उत्पादन होता था, जिनमें पेपर, चीनी, सीमेंट, एस्बेस्टस, वनस्पति, और दूसरी चीज़ें भी शामिल थीं। इस इंडस्ट्री की स्थापना रामकृष्ण डालमिया ने की थी, जब 1933 में उन्होंने एक चीनी मिल से काम शुरू किया था। उनके काम में उनके भाई जयदयाल डालमिया और दामाद साहू शांति प्रसाद जैन, उनकी मदद करते थे।

उनके बाद उनके दामाद साहू शांति प्रसाद जैन ने कारोबार संभाला और उनके दौर में कंपनी बड़ी होने लगी। डालमियानगर नाम से पूरा शहर 1940 से 1970 के दशकों में उठकर खड़ा हो गया। जमशेदपुर के बाद ये सबसे बड़ा औद्योगिक शहर था। चीनी के अलावा अब यहाँ पेपर, सीमेंट, रसायनों, वनस्पति जैसी चीज़ों का उत्पादन भी शुरू हो गया था। डालमियानगर की फैक्ट्रियों में काम करने वालों के लिए इस शहर में क्लब, अस्पताल, स्कूल, बाजार, बाग़-बगीचे, रिहाईशी मकान, जैसी सारी सुविधाएँ थीं। एक दौर में रोहतास इंडस्ट्रीज के पास अपना खुद का एयर-फील्ड और चार्टर्ड हवाईजाहज भी थे। देश भर के सबसे दक्ष पेशेवर कभी यहाँ काम करने आते थे।

सत्तर के दशक के अंत में इस इलाके में अपराधियों ने सर उठाना शुरू किया। डकैतियां और अपहरण आम बात हो गए। धीरे-धीरे प्रबंधन के कर्मचारियों ने दूसरी जगहों पर काम ढूंढना शुरू किया। कंपनी ने ऐसा झटका कोई पहली बार झेला हो, ऐसा बिलकुल भी नहीं था। जब 1968 में डालमियानगर का चीनी मिल बंद हुआ तब भी कई लोगों का काम जाता रहा था। उस वक्त डालमियानगर में दूसरी कंपनियों में उन्हें काम दे दिया गया था और कोई ख़ास दिक्कत नहीं हुई। इस बार जब समस्या शुरू हुई तो अच्छे प्रबंधक पहले ही जा चुके थे। यूनियनबाजों के लिए ये अपनी राजनीति चमकाने का सुनहरा मौका था। उनकी कृपा से समस्या सुलझने के बदले और बिगड़ती गयी, और आखिर एक दिन कंपनी में काम करने वाले सुरक्षा गार्डों के अलावा सबके लिए फैक्ट्री बंद हो गयी।

डालमियानगर इंडस्ट्रीज डिस्प्यूट्स एक्ट 1947 के अंतर्गत बंद हुआ था, क्योंकि वो बिजली का बकाया 5.18 करोड़ का बिल चुकाने में असमर्थ थे। राज्य सरकार का कहना था कि इस एक्ट की धारा 25(सी) में हुए संशोधन के तहत बिना उनकी पूर्व अनुमति के फैक्ट्रियां बंद नहीं की जा सकती। तीसरा पक्ष मजदूर यूनियन का था जिनका कहना था कि इस खींच-तान में जो मजदूरों की तनख्वाह का 89 लाख रुपया बकाया है, वो तो चुकाया जाना चाहिए। इस सबको लेकर लम्बी मुकदमेबाजी हुई और मामला सर्वोच्च न्यायलय तक गया। कंपनी का कहना था कि जो तैयार माल उनके पास है, कुछ बची हुई मशीनें और कुछ कबाड़ बेचकर करीब 92 लाख आयेंगे, उनसे ये तनख्वाह के पैसे चुकाने दिए जाएँ।

इसमें भी लम्बी खींचतान चली और आखिरकार तैयार माल वगैरह को बेचने की इजाजत मिली। लम्बे समय तक इस फैसले पर अमल नहीं हो पाया। इस बीच डालमियानगर में सिर्फ रोहतास ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज ही बंद नहीं हुई थी। उसके तैयार माल और बचे-खुचे कबाड़ से जो दूसरी चीज़ें बनाने वाले उद्यम थे, वो भी बंद हो गए। खाने-पीने और मनोरंजन से जुड़े व्यवसाय ख़त्म हो गए। घरेलु काम काज, इलेक्ट्रीशियन, प्लम्बर, मैकेनिक, और कितने ही लोग जो डालमियानगर में काम करने वालों के घरों के काम के जरिये रोजगार पाते थे, उनके लिए भी कोई ठिकाना नहीं बचा। परिवार में पांच लोग मान लिए जाएँ तो सीधे तौर पर कम से कम साठ हज़ार और अप्रत्यक्ष रूप से तीन लाख लोगों के लिए कोई आसरा नहीं बचा।

जब आप सोचें कि बिहार का मजदूर-श्रमिक, चाहे वो ब्लू कालर हो या व्हाईट कालर, बिहार लौटकर काम क्यों नहीं करना चाहता तो डालमियानगर देखिएगा। उसे पता नहीं कि कब उसके पैरों के नीचे से जमीन गायब हो जायेगी, इसलिए वो भरोसा ही नहीं करना चाहता, ये शायद समझ में आएगा। बारह हजार से अधिक श्रमिकों की पीठ पर चढ़कर हुए आन्दोलनों ने बिहार को दो मुख्यमंत्री दिए –केदार पाण्डेय (19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक) और बिन्देश्वरी दूबे (12 मार्च 1985 से 13 फ़रवरी 1988 तक)। मगर किसी के मुख्यमंत्री बनने से रोहतास ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज की 17 इकाइयों के खुलने का क्या लेना देना? यहाँ काम करने वालों ने अपना और अपने परिवारों का भरण-पोषण कैसे किया, ये वो ही जानते होंगे।

बाकी वो प्रवासी श्रमिक जिसकी तस्वीरें आपने देखी होंगी, वो हर बार जाते वक्त इंतज़ार तो अब भी करता है। सोचता है कि शायद जाते हुए उसे कोई रोककर मना लेगा, वापस बुलाएगा। फिर उसका पुराना अनुभव तो है ही, वो समझता है कि ऐसा कुछ होने वाला नहीं।

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