रेगिस्तान का बढ़ना – राणाराम बिश्नोई

0
202
Ranaram Bishnoi

राजस्थान की पारंपरिक वेशभूषा में एक पगड़ी भी होती है | वैसे तो ये पूरे ही भारत में होती है लेकिन राजस्थानी पगड़ी कुछ ज्यादा ही रंग बिरंगी होती है | दूर से ही दिख जाएगी | ऐसे में जब आप राजस्थान से गुजरें और कोई सफ़ेद सी पगड़ी में दिख जाए तो थोड़ा अजीब लगेगा | लेकिन जो लोग अक्सर राजस्थान से गुजरते हों, या दो चार बार भी गए हों उन्हें पता होता है की ये सफ़ेद वेश भूषा वाले लोग बिश्नोई हैं | ये लोग हमेशा सफ़ेद कपड़े पहने होने के लिए भी जाने जाते हैं |

इसके अलावा ये लोग वनों और प्राणियों के संरक्षण करने के लिए भी जाने जाते हैं | मेनका गाँधी और Green Peace के आने से बहुत पहले ही ये कुनबा / कबीला जीव जंतुओं और पौधों को बचाने में लगा हुआ है | जोधपुर से करीब सौ किलोमीटर दूर एकलखोरी नाम का एक गाँव है | वहां राणाराम बिश्नोई रहते हैं | करीब पचहत्तर साल के मजबूत कद काठी के इस युवा को मुख्य धारा की मीडिया ने कम ही जगह दी है |

इनके इलाके को निगलने के लिए रेगिस्तान आ रहा था | शत्रु मजबूत था रेत, गर्मी, तेज़ हवाओं के हथियारों से लैस | इससे जा भिड़ने के लिए राणाराम बिश्नोई ने किसी सरकारी मदद की प्रतीक्षा नहीं की | उन्होंने बबूल, कीकड़, नीम और बोगनवेलिया के अपने परंपरागत हथियार निकाले और रेगिस्तान का बढ़ना रोकने में जुट गए |

राणाराम बिश्नोई उसी काबिले से आते हैं जिनका जिक्र आपने चिपको आन्दोलन में अपनी स्कूल की किताबों में पढ़ा है | पड़ोस के एक कूएँ से घड़े में पानी भर भर कर बरसों से राणाराम बिश्नोई नए पौधों को देते रहे हैं | कुछ जंगली और कुछ पालतू जानवरों से पेड़ों को बचाने के लिए शुरू में उन्हें झाड़ों से घेरना पड़ता है | मगर राणाराम बिश्नोई बताते हैं की इनका सबसे बड़ा दुश्मन जानवर नहीं दोपाया है | वो समझता ही नहीं की लालच का कोई अंत नहीं है | अपने पेड़ों और जीव जंतुओं के बिना प्रकृति सबसे पहले मानव को ही लील लेगी |

जिन्हें “बिश्नोई” पता नहीं है उनके लिए सलमान खान और काले हिरण का किस्सा भी है | शिकार से किसी बड़े आदमी को रोकने की हिम्मत किसी और में है क्या ? रेगिस्तान को रोकने की तो सोचते भी नहीं होंगे !

Leave a Reply