बदमाशों के छक्के छुड़ाने वाले बिहार के कॉपगुरु

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मोनू कुमार, पटना: आईआईटी कानपुर जैसे उच्च इंजिनियरिंग संस्थान से पढ़ाई करने के बाद अक्सर लोग कॉर्पोरेट दुनिया का रूख करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी युवा होते हैं जो खुद को क्यूबिकल तक सीमित नहीं रखना चाहते और अपने देश केलिए कार्य करना चाहते हैं। जन सेवा की यह भावना 2001 में आईआईटी कानपुर से ग्रेजुएट हुए विकास वैभव को भारतीय पुलिस सेवा तक ले आई। 2003 बैच के बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी विकास वैभव बिहार के कई नक्सल प्रभावित जिलों में कार्य कर चुके है। इसके अलावा उन्होंने नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी (एनआईए) में एसपी और बिहार की राजधानी पटना के वरीय पुलिस अधिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दी है। वर्तमान में वे बिहार एंटी टेररिस्ट स्क्वैड (एटीएस) में डीआईजी के पद पर कार्यरत है। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी इन्हें ‘कॉपगुरु’ के नाम से पुकारते हैं।

शुरुआती  जीवन

विकास वैभव मूल रूप से बिहार के बेगूसराय जिले के बीहट के रहने वाले हैं। “द बेटर बिहार” से बात करते हुए उन्होंने बताया कि उनके जन्म के कुछ ही समय बाद उनके पिताजी जो उस वक्त इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन में कार्यरत थे, का ट्रांसफर गुवाहाटी हो गया था। विकास दूसरी कक्षा में थे जब उनके पिताजी का ट्रांसफर गुवाहटी से बरौनी हो गया। आठवीं तक की पढ़ाई बरौनी में पूरी करने के बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चले गए। उन्होंने वर्ष 1997 में भारत के सबसे प्रतिष्ठित इंजिनियरिंग संस्थानों में से एक आईआईटी कानपुर में नामांकन लिया। वे 2001 में मेकैनिकल ब्रांच से ग्रेजुएट हुए।

देश सेवा की भावना लाया सिविल सेवा में

स्कूल में टेबल टेनिस खेलने के शौकीन विकास वैभव बचपन से ही देश और राज्य की सेवा करना चाहते थे। यही भावना उन्हें कार्पोरेट वर्ल्ड की जगह सिविल सेवा में लेकर आई। 2003 में सिविल सेवा परीक्षा में वैभव की ऑल इंडिया रैंकिंग 60वीं थी और उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा ज्वाइन की।

करियर के महत्वपूर्ण पड़ाव

2006 में पटना के सिटी एसपी से रातों-रात विकास वैभव का ट्रांसफर पश्चिम चंपारण जिले के बगहा में हो गया था। बगहा में उस वक्त अपराध चरम पर था और हत्या और किडनैपिंग आम थी। उन्होंने वहां की पुलिस की कार्यशैली बदली और आम लोगों के बीच पहुंचे। आम लोगों के साथ और तेज तर्रार पुलिस रेड ने वहां की स्थिति बदल दी। कई अपराधियों ने सरेंडर किया और कानून व्यवस्था में बहुत सुधार हुआ। इसके बाद नक्सल प्रभावित रोहतास जिले में भी वैभव का कार्य काबिलेतारीफ रहा। विकास वैभव कम्युनिटी पुलिसिंग के जरिए स्थानीय आदिवासियों को रोहतास किले की विरासत से जोड़ने में कामयाब रहे। लोगों के सहयोग से वहां शांति व्यवस्था दुरूस्त हुई और आजादी के बाद 2009 में पहली बार रोहतास किले पर तिरंगा फहराया गया। उससे पहले उग्रवादी वहां काला झंडा फहराते थे। इसके बार दरभंगा और फिर चार साल एनआईए में भी उन्होंने कार्य किया। फिर पटना एसएसपी, हेडक्वार्टर और भागलपुर रेंज डीआईजी के बाद अभी बिहार एटीएस में डीआईजी है।

जब रोहतास में पहली बार पड़े वोट

रोहतास बिहार के नक्सल प्रभावित जिलों में से एक है। वहां के दूर-दराज और पहाड़ी इलाकों का विकास कम हुआ है। जिस कारण इन क्षेत्रों में नक्सलियों का प्रभाव ज्यादा रहता हैं। 2009 में आजादी के बाद पहली बार रोहतास में पहाड़ी पर चुनाव हो पाया था। उस समय रोहतास पुलिस की कमान विकास वैभव के हाथों में थी। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि, “पहाड़ी पर चुनाव कराना बड़ी चुनौती थी। 2009 लोक सभा चुनाव के दौरान हमने बीएसएफ की मदद से पहाड़ी पर छः बूथों में चुनाव संपन्न कराए थे। हालांकि यह बिल्कुल भी आसान नहीं था। 16 अप्रैल को चुनाव की तारीख तय थी और इसके लिए बीएसएफ की एक कंपनी बुलाई गई थी। लेकिन 14-15 अप्रैल की मध्य रात्रि को बीएसएफ की कंपनी पर हमला जाता है। जिसके बाद चुनाव स्थगित कर दिया गया था फिर मई महीने में बीएसएफ की 12 कपनियों और राज्य पुलिस की चार कंपनियों की मदद से इन छः बूथों पर चुनाव संपन्न कराए गए थे। इस तरह वहां के लोगों ने आजादी के बाद पहली बार लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सा लिया था।

कॉपगुरु

इतिहास में रूचि रखने वाले विकास वैभव “साइलेंट पेजेज: ट्रेवल्स इन द हिस्टोरिकल लैंड ऑफ  इंडिया” के नाम से ब्लॉग भी लिखते है। इस ब्लॉग में वे देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ी ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में लिखते है। वे “कॉप इन बिहार” और “इंटलेक्चुअल ट्रेडिशन” के नाम से दो और ब्लॉग लिखते है। इसके अलावा विकास अपने यू ट्यूब चैनल “विकास वैभव आईपीएस” और फेसबुक पेज के माध्यम से सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन भी करते है। इसलिए लोग इन्हें ‘कॉपगुरु’ भी कहते है। उनके यू ट्यूब चैनल के पांच हजार से अधिक सब्सक्राइबर हैं तो वहीं फेसबुक पेज को ढ़ाई लाख से अधिक लोगों ने लाइक किया हैं। वे समय निकालकर पटना स्थित चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में आतंकवाद पर लेक्चर भी देते है। लिखने में खास रूचि रखने वाले इस सुपरकॉप को ट्रेवलिंग और फोटोग्राफी का भी शौक है।

सत्येन्द्र  दुबे  पुरस्कार

2019 में विकास वैभव को सत्येंद्र दुबे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। यह पुरस्कार पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ कार्य करने वाले आईआईटी के एल्युमनस को दिया जाता है। आईआईटी कानपुर के भूतपूर्व छात्र सत्येंद्र दुबे ने 2003 में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में चल रहे घोटालों के बारे में प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखी थी। जिसके बाद बिहार के गया जिले में उनकी हत्या कर दी गई थी। वर्ष 2005 में उनके सम्मान में इस पुरस्कार की शुरुआत हुई थी और तभी से यह पुरस्कार हर वर्ष दिया जाता है। पहला पुरस्कार दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मिला था।

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