मेरी भी आवाज़ सुनो

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बच्चों के बारे में सोचते वक्त उसके अभिभावकों को ये पता होता है कि एक दिन ये बच्चे बड़े हो जायेंगे। उस दिन उनकी देखभाल करने की जरुरत नहीं होगी, उल्टा अभिभावकों के बुढ़ापे में बड़े हो चुके बच्चे ही देखभाल कर रहे होंगे। सोचिये कि कहीं ऐसा हो जब अभिभावकों को पता हो कि ये बच्ची या बच्चा बड़ा नहीं होने वाला। मानसिक व्याधियों से ग्रस्त कुछ लोगों में ऐसे लक्षण देखे जाते हैं। उनके अभिभावकों को क्या कभी ये ख़याल आता होगा कि उनके बूढ़े होने पर, गुजर जाने के बाद, इन बच्चों का क्या होगा? उनकी देखभाल कौन करेगा?

डरावना ख़याल है। चुनावी दौर में जहाँ हर रोज कोई चटपटी मुख्य खबर बहस का मुद्दा बनती हो, ऐसे मौसम में भारत में मानसिक व्याधियों की बात करना शायद उतना सही मौका भी नहीं। कई और मानसिक व्याधियों की तरह ऑटिज्म की बात वैसे भी नहीं होती। वर्ल्ड ऑटिज्म डे 2 अप्रैल को मनाया जाता है। आमतौर पर जैसे मानसिक व्याधियों का मतलब पागल होना या मंदबुद्धि होना मान लिया जाता है, ऑटिज्म वैसा नहीं होता। ये एक बड़ी समस्या इसलिए है, क्योंकि इसमें संवाद की क्षमता करीब-करीब नहीं के बराबर हो सकती है। कुछ रिपोर्ट ऐसा मानती हैं कि भारत में दस वर्ष से कम आयु के दस बच्चों में से एक बच्चा इस बीमारी से ग्रस्त है।

संवाद की क्षमता का जाना मतलब केवल बोलने में असमर्थ होना नहीं है, ये अपनी बात या सोच दूसरों तक पहुंचा पाने में भी कई कठिनाइयों का सामना करते हैं। इस बीमारी पर शोध करने वालों के लिए भी ये एक समस्या है क्योंकि इसमें न तो बीमारी से ग्रस्त आपकी बात समझता है, ना अपनी बात समझा पाता है। थोड़े साल पहले जापान के ऑटिज्म से ग्रस्त एक 13 साल के बच्चे ने एक किताब लिखी “द रीज़न आई जम्प”। ये लेखक नाओकी हिंगाशिदा ऑटिज्म के शिकार लोगों के अनुभवों के बारे में बताते हैं कि कल्पना कीजिये कि आप सभी भाषाएँ भूल गए हों। जनरेटर के शोर और किसी अच्छे से गाने में आपके लिए कोई फर्क न बचे तो क्या होगा?

एक साथ सर में 20 अलग अलग रेडियो चैनल बजने लगें, एक से अधिक विचार एक साथ दिमाग में आते हों तो कैसा लगेगा? ऑटिज्म से ग्रस्त लोगों के लिए लड़ाई सिर्फ इतनी ही नहीं होती। बहरी दुनिया के लोगों के लिए वो “मंदबुद्धि” हैं, इस #टैग से भी उन्हें निपटना है। दूसरी तरफ उनके अभिभावकों के बारे में सोचिये कि जब पहली बार डॉक्टर उन्हें बताएगा कि उनके बच्चे को बीमारी क्या है, तब उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी? पहले तो लगेगा कि ये डॉक्टर उतना अच्छा नहीं, हम किसी बेहतर डॉक्टर से दिखायेंगे। फिर थोड़े समय में लगने लगेगा कि दुनियां के किसी कोने में तो इसका इलाज होता होगा। फिर सूझेगा कि इस मुश्किल का इल्जाम किसपर थोपें? किस्मत पर, जहाँ बच्चा पैदा हुआ उस अस्पताल पर, बच्चे की माँ पर, अपने पापों पर?

नाओकी हिंगाशिदा ने जापानी में अलग तरीके से लिखना-टाइप करना एक विशेष शिक्षक से सीखकर अपनी किताब को लिखा था। ये कारनामा उन्होंने कैसे किया होगा, पता नहीं! जिनका बच्चा खुद ऑटिज्म से ग्रस्त था ऐसे एक दम्पति ने इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद कर डाला है। ये ऑटिज्म से पीड़ित लोगों के मन में चलते विचारों और कई सवालों के जवाब देती है। ये पुस्तक बिना कुछ कहे ये भी बता गई कि हम खुद किस किस्म के इंसान हैं और सोचते कैसे तरीके से हैं। इसे पढ़ने की सलाह देने जैसा मेरा कोई इरादा भी नहीं। हाँ अगर आपके परिचितों में से कोई ऑटिज्म से ग्रस्त हो तो इसे देखिये, शायद आप एक व्यक्ति को थोड़ा बेहतर समझ पायेंगे।

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