4.5 करोड़ बच्चों के हितों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलों से अपील

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पटना, 5 अक्टूबर: आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र बच्चों से जुड़े मुद्दों को लेकर यूनिसेफ और चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के चाइल्ड राइट्स सेंटर (सीआरसी-सीएनएलयू) द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट मैनिफेस्टो पर चर्चा के लिए सोमवार को एक ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में यूनिसेफ और सीएनएलयू के अलावा विभिन्न सामाजिक संगठनों जैसे सेव द चिल्ड्रेन, वर्ल्ड विजन, ह्यूमन लिबर्टी नेटवर्क, प्रथम, सेंटर डायरेक्ट, अदिति, सीसीएचटी, जन जागरण संस्थान, रेनबो होम्स, बालसखा, एक्शन एड के 100 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और अपने सुझाव रखे.

यूनिसेफ के कार्यक्रम पदाधिकारी शिवेंद्र पांडे ने कार्यक्रम के शुरूआती संबोधन में कहा कि देश में बच्चों की आबादी 36 फीसदी है जबकि बिहार में यह 46 फीसदी है. चुनाव एक सुअवसर है जब हम बच्चों की बातों को जोरदार तरीके से उठा सकते हैं. राजनीतिक दल जब आम जनता के बीच अपना घोषणा पत्र लेकर जाते हैं तो उन्हें यह बताना जरूरी है कि बच्चों की शिक्षा, खेल, कौशल और व्यक्तित्व विकास को भी उसमें प्रमुखता से शामिल किया जाए. बच्चों, विशेषत: वंचित समाज के बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण संबंधी मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए. साथ ही उन्होंने 7 अक्टूबर को बच्चों के साथ होने वाली परिचर्चा के दौरान मिलने वाले सुझावों पर ध्यान रखने का आग्रह किया.

सीआरसी समन्वयक श्रीमती स्नेहा ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जारी किये जाने वाले घोषणा पत्रों का पार्टी आधारित लोकतंत्र में खास महत्व होता है. हालांकि, 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों को मतदान करने का अधिकार नहीं है लेकिन वे न सिर्फ हमारा भविष्य हैं बल्कि भविष्य के मतदाता भी हैं. इस सन्दर्भ में बच्चों के मुद्दों को लेकर आज की परिचर्चा का आयोजन किया गया है ताकि राजनीतिक दलों तक इन बातों को रखा जा सके.

यूनिसेफ की संचार विशेषज्ञ निपुण गुप्ता ने कहा कि आज की यह परिचर्चा 243 जनप्रतिनिधियों बनाम साढ़े चार करोड़ बच्चों पर केन्द्रित है. चुनावी सन्दर्भ में बड़ा सवाल ये है कि क्या बिहार के भावी विधायक राज्य के वर्तमान और भविष्य यानि बच्चों की बात सुनेंगे? ज़मीनी स्तर पर काम करने के लम्बे अनुभव के कारण सामाजिक संगठन बच्चों से जुड़े मुद्दों को वर्तमान में चल रहे चुनावी परिचर्चा में ज़्यादा संजीदगी और प्रभावी ढंग से उठा सकते हैं.

इंडिपेंडेंट थॉट के विक्रम श्रीवास्तव जिन्होंने ड्राफ्ट मैनिफेस्टो को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है, द्वारा इस कार्यक्रम का संचालन किया गया. उन्होंने मैनिफेस्टो में उद्धृत बच्चों के अधिकार और सतत विकास से जुड़े वैसे सभी मुद्दे जिन्हें राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल कर सकते हैं, पर विस्तार पर प्रकाश डाला.

चुनावी घोषणा पत्र में बच्चों से जुड़े मुद्दों जैसे प्रति बच्चे पर खर्च बढ़ाने, जिला स्तर पर चाइल्ड केयर फण्ड की स्थापना, बाल और मातृ मृत्यु दर को कम करने, टीकाकरण, नई शिक्षा नीति, बच्चों की तस्करी, मिड डे मिल 12वीं कक्षा तक, साफ़ पीने का पानी, किशोर सशक्तिकरण समिति का गठन आदि को शामिल किया जाना चाहिए.

वेबिनार में मौजूद विभिन्न सामाजिक संगठन के प्रतिनिधियों ने बच्चों के हितों की रक्षा हेतु अपने-अपने सुझाव भी दिए. बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध के प्रति जीरो टॉलरेंस पालिसी, छात्राओं के ड्राप आउट, एईएस, किशोरियों की सुरक्षा, आंगनवाड़ी केन्द्रों में आधारभूत संरचना, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सुदृढ़ करने से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव मिले.

सेव द चिल्ड्रेन के राफे एज़ाज हुसैन ने स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की बात करते हुए कहा कि वर्ष 2025 तक जीडीपी का 5% स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए. भोरे कमिटी ने सन 1946 में ही स्वास्थ्य पर जीडीपी का 5% खर्च करने की अनुसंशा की थी, लेकिन अभी तक हम इस आकड़े तक नहीं पहुँच पाए हैं. बिहार में करीब 40% लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले हो जाती है और जब इनके बच्चे पैदा होते हैं तो उनका वजन काफी कम होता है जिससे वे आसानी से कुपोषण के शिकार बन जाते हैं.

नारी गुंजन की सुधा वर्गीज ने कहा कि कोविड की वजह से दलित और महादलित समुदाय के बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य पर गहरा असर हुआ है. इनसे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाना चाहिए.

यूनिसेफ की बाल सुरक्षा अधिकारी गार्गी साहा ने कहा कि माइग्रेशन के कारण बच्चों की तस्करी के मामले बढ़ रहे है जो घोर चिंता का विषय है. उन्होंने चाइल्ड फ्रेंडली पुलिस स्टेशन स्थापित करने पर जोर देते हुए कहा कि इन थानों में जो नोडल पुलिस पदाधिकारी नियुक्त हों उन्हें सिर्फ बच्चों से जुड़े कार्य ही सौंपे जाएं. साथ ही, वर्तमान में बच्चों से जुड़े कानून प्रभावी ढंग से लागू होने चाहिए.
यूनिसेफ के शिक्षा अधिकारी रवि दयाल ने कहा कि कोविड के कारण सभी स्कूल बंद होने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है. इनमें भी वैसे बच्चे जो समाज के कमजोर तबके से आते है उन्हें सबसे ज्यादा परेशनियाँ झेलनी पड़ रही है. इस पूरे लॉकडाउन के दौरान एक दबाव वाला वातावरण बन गया है. इससे उबारने के लिए बच्चों की काउंसलिंग होनी जरुरी है.

सेव द चिल्ड्रेन के पियूष कुमार ने कहा कि माइग्रेशन की वजह से बड़ी संख्या में बच्चे समस्याग्रस्त हुए हैं. इन बच्चों तक सामाजिक योजनाओं का लाभ नहीं पहुँच पा रहा जिसके लिए राज्यों को आपस में सामंजस्य स्थापित कर बच्चों की भलाई के लिए योजना बनानी चाहिए.

सीआरसी की एडवोकेसी समन्वयक सुश्री प्रीति आनंद एवं सीआरसी समन्वयक श्रीमती स्नेहा ने धन्यवाद ज्ञापन किया और वेबिनार में उपस्थित सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आपके द्वारा प्राप्त हुए बहुमूल्य सुझावों को हम सभी राजनीतिक दलों तक पहुंचाएंगे.

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