खेती, शिक्षा और सांप्रदायिक सदभाव के मुद्दे ने बापू को बिहार से जोड़ा

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रजनीश

महात्मा गांधी का बिहार से एक खास रिश्ता था। इस रिश्ते के बारे में जब भी बात होती है, तो हमारे जेहन में आम तौर पर सिर्फ चंपारण सत्याग्रह का नाम उभरता है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटने पर इस राज्य के साथ बापू के रिश्ते में तीन अहम पड़ाव सामने आते हैं। चंपारण सत्याग्रह, बिहार विद्यापीठ की स्थापना और आजादी की घोषणा के बाद बिहार में हुए दंगों को रोकने में उनकी भूमिका। दूसरे शब्दों में खेती – किसानी के मुद्दे, स्वदेशी शिक्षा प्रणाली की भूख एवं सांप्रदायिक सदभाव की प्रतिबद्धता ने बापू को बिहार से जोड़ा।


खेती – किसानी का मुद्दा
बिहार का चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का अहम बिन्दु था। यह सत्याग्रह चंपारण के किसानों के साथ – साथ महत्मा गांधी के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसी सत्याग्रह ने महात्मा गांधी को भारत में आंदोलन की जमीन तैयार करने का एक बड़ा मंच प्रदान किया। चंपारण के इलाके में 1850 के आसपास नील से अधिक मुनाफ़ा होने के कारण गन्ने की खेती को कम करके निलहे गोरों द्वारा नील की खेती को बढ़ावा दिया जाने लगा। इस खेती में ‘तीन कठिया’ प्रथा काफी प्रचलित थी। इस प्रथा में निलहे गोरे रैयतों से प्रति बीघा तीन कट्ठा जमीन में नील की खेती कराते थे। नील एक व्यवसायिक फसल थी, लेकिन किसान इसे इसलिए नहीं करना चाहते थे क्योंकि इसका मुनाफा निलहों की जेब में चला जाया करता था और खेती के क्रम में होने वाली तमाम परेशानियां रैयतों के हिस्से में आती थीं। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत तो थी, लेकिन इसमें ज्यादातर फैसले रैयतों के खिलाफ हुआ करते थे।


जब जर्मनी में कृत्रिम नील के उत्पादन के साथ भारत में नील की खेती में कमी आने लगी, तो निलहे गोरे किसानों से लगान के अतिरिक्त 46 प्रकार के टैक्स वसूलने लगे। ये सभी टैक्स गैरकानूनी थे, लेकिन निलहे गोरों को इसकी परवाह नहीं थी। लिहाजा चंपारण के रैयत निलहों से मुक्ति के लिए छटपटा रहे थे। इन शोषित किसानों को संगठित करने का बीड़ा पश्चिम चंपारण के सतवरिया गांव के निवासी पंडित राजकुमार शुक्ल ने उठाया। वे अपनी जेब से पैसा खर्च कर थाना और कोर्ट में रैयतों की मदद किया करते थे। उन्होंने कानपुर जाकर ‘प्रताप’ के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी को किसानों का दुखड़ा सुनाया। विद्यार्थीजी ने 4 जनवरी 1915 को प्रताप में ‘चंपारण में अंधेरा’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया और शुक्लजी को गांधीजी से मिलने की सलाह दी. तब शुक्लजी साबरमती आश्रम पहुंचे। लेकिन गांधीजी के पुणे में होने के कारण उन दोनों की मुलाकात नहीं हो सकी।

इस बीच, लखनऊ में 26 से 30 दिसंबर 1916 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का 31वां वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ। राजकुमार शुक्ल इस अधिवेशन में चंपारण के निलहों से उत्पीड़ित रैयतों के प्रतिनिधि के रूप में हरिवंश सहाय, गोरख प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, रामदयाल प्रसाद साहू और पीर मोहम्मद मुनिस के साथ शामिल हुए। अधिवेशन के दौरान शुक्लजी ने गांधीजी से निलहों के जुल्म से चंपारण के रैयतों को बचाने और चंपारण चल कर रैयतों की दशा अपनी आंखों से देखने का अनुरोध किया। अधिवेशन में चंपारण से संबंधित प्रस्ताव पारित हुआ। लेकिन गांधीजी को चंपारण ले जाने का शुक्लजी का इरादा नहीं बदला। 9 अप्रैल 1917 को शुक्लजी के साथ गांधीजी मोतिहारी के लिए चल पड़े। गांधीजी 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी पहुंचे। उनके पहुंचते ही लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर व्यक्ति अपनी आपबीती सुनाने लगा। प्रशासन द्वारा धारा 144 की नोटिस के तहत गांधीजी को अविलंब मोतिहारी छोड़ने का आदेश दिया गया। गांधीजी ने इस नोटिस को अनदेखा कर दिया। इस पर गांधीजी के खिलाफ आज्ञा उल्लंघन के मुकदमे की सुनवाई शुरू हो गई। गांधीजी ने इस आरोप को स्वीकार कर लिया। तब जिलाधीश ने गांधीजी से एक दिन के लिए रैयतों की आपबीती सुनने का काम स्थगित करने की राय दी ताकि वह सरकार से परामर्श ले सकें। गांधीजी ने उनकी बात मान ली। फिर सरकार ने गांधीजी पर से धारा 144 हटा लेने की सूचना दी। सरकार की ओर से उच्चाधिकारियों को यह आदेश दिया गया कि वे गांधीजी की पूरी सहायता करें। इसे गांधी जी की पहली जीत के तौर पर देखा गया। 

मोतिहारी के बाद गांधीजी बेतिया पहुंचे। उन्होंने रैयतों का बयान लेना जारी रखा। इस बीच, बिहार के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ड गेट ने पत्र लिखकर गांधी को चार जून 1917 को रांची में मिलने के लिए आमंत्रित किया। इस मुलाकात के बाद एक जांच कमिटी गठित की गई। इसमें गांधीजी को भी सदस्य बनाया गया। जांच कमिटी के सदस्यों में कोई एक मत नहीं था। लेकिन बहुमत के आधार पर सरकार ने 4 मार्च 1918 को चंपारण अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के जरिए ‘तीन कठिया प्रथा’ समाप्त कर दी गई। निलहे गोरों को हमेशा के लिए चंपारण से विदा होना पड़ा। यह भारत में अंग्रेजों के खिलाफ गांधीजी की पहली बड़ी राजनीतिक जीत थी। 

स्वदेशी शिक्षा प्रणाली की भूख
खेती – किसानी के मुद्दे के अलावा स्वदेशी शिक्षा प्रणाली की भूख गांधीजी को बिहार खीच लायी। गांधीजी का मानना था कि अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति को वैचारिक एवं राजनीतिक रूप से परास्त करने के लिए भारतीय संस्कृति एवं जरूरतों पर आधारित शिक्षा प्रणाली स्थापित करना होगा। इस लिहाज से, बिहार विद्यापीठ की परिकल्पना चंपारण सत्याग्रह के दौरान की गई। इसके लिए बापू ने झरिया के गुजराती व्यवसयियों से चंदा लिया। दो महिलाओं ने तो अपना सारा गहना दे दिया। झरिया से चंदे में एकत्रित 66 हजार रुपये लेकर गांधीजी राजधानी पटना आये और ब्रजकिशोर प्रसाद, मौलाना मजहरुल हक और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ मिलकर 6 फरवरी, 1921 को बिहार विद्यापीठ की स्थापना की। इस विद्यापीठ के प्राचार्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद, उप-कुलपति ब्रजकिशोर प्रसाद और कुलपति मौलाना मजहरूल हक नियुक्त किये गये। बिहार विद्यापीठ से संबद्ध होकर सैकड़ों विद्यालय कार्य करते रहे। इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि बिहार विद्यापीठ बनाने के लिए 1916 में ब्रजकिशोर प्रसाद ने विधान परिषद में आवाज उठायी थी।


बिहार विद्यापीठ स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का एक केंद्र भी था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार आने पर बापू बिहार विद्यापीठ में रुकते थे। विद्यापीठ के संग्रहालय में बापू और राजेन्द्र बाबू से जुड़ी कई स्मृतियां सुरक्षित हैं। बिहार विद्यापीठ में आज भी वह चबूतरा मौजूद है जिस पर बैठकर बापू बिहार विद्यापीठ से शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों को डिग्री बांटते थे। इस चबूतरे के बगल में वह स्तंभ भी आज वैसे ही खड़ा है जिसपर बिहार विद्यापीठ के चारों शिल्पकार मिलकर झंडा फहराया करते थे।

सांप्रदायिक सदभाव की प्रतिबद्धता
1946 आते – आते यह स्पष्ट होने लगा था कि अंग्रेजों की इस देश से हमेशा के लिए विदाई अब तय है। लेकिन जिन्ना पाकिस्तान बनाने के उतावलेपन में थे। ‘‘डायरेक्ट एक्शन’’ (सीधी कार्रवाई) की उनकी घोषणा ने भारत के सांप्रदायिक सदभाव के ताने – बाने पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया था। बापू ने इस खतरे को भांपते हुए आखिरी वायसराय माउंटबेटन के साथ अपनी मुलाकात में साफ-साफ कह दिया कि “अंग्रेजी तंत्र की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति ने वह स्थिति बना दी है, जब सिर्फ यही विकल्प बचे हैं कि या तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंग्रेजी राज ही चलता रहे या फिर भारत रक्त स्नान करे। अवश्य ही, भारत रक्त-स्नान का सामना करने को तैयार है।’’
पूर्वी बंगाल का नोआखाली जिला गांधीजी द्वारा इंगित “रक्त – स्नान” का पहला शिकार बना। यहां बड़ी संख्या में हिन्दुओं की जान गयी। हिंदू-मुस्लिम एकता के गांधीजी के प्रयासों पर यह एक बहुत बड़ा धक्का था। उन्होंने शांति स्थापित करने के लिए तुरंत दिल्ली से नोआखाली जाने का निर्णय लिया। पांच महीनों तक नोआखाली में रहकर मेहनत करने का गांधीजी का निर्णय रंग लाया, वहां अमन – चैन कायम हो गया। अब बापू की चिंता बिहार को लेकर थी, जहां नोआखाली दंगों की प्रतिक्रिया खदबदा रही थी। पटना, छपरा, मोधीर, भागलपुर, संथाल परगना और गया जिले दंगों से दहल उठे थे। हालांकि, 6 नवंबर 1946 को नोआखाली में उनकी इस घोषणा के बाद कि जब तक बिहार का पालगपन बंद नहीं होता, वे हर रोज आधे दिन का उपवास रखेंगे, बिहार की हिंसा में एकदम से कमी आ गई थी। लेकिन असल काम था जख्मों पर मरहम लगाना और उजड़े हुए घरों को फिर से बसाना।

5 मार्च, 1947 को गांधीजी बिहार पहुंच गए। बिहार की राजधानी पटना पहुंचने के बाद उन्होंने 13 मार्च को परसा व सिपारा और 14 मार्च को खुसरूपुर इलाकों का दौरा किया। 15 मार्च को गर्वनर से भेंट की। 17 मार्च को बापू ने मसौढ़ी, रहमत गंज, मकाना, पुरानी बाजार मसौढ़ी आदि इलाकों में जाकर भाईचारे का संदेश दिया। 18 मार्च को मसौढ़ी के बीर आदि क्षेत्रों में भ्रमण किया। 24 मार्च को पटना के ब्रह्मपुरा का दौरा करने के बाद गांधीजी दिल्ली गए। फिर 13 अप्रैल को सैयद महमूद के साथ पटना वापस लौटे और 18 अप्रैल तक रूककर पीड़ितों के लिए चंदा इकठ्ठा करने और गांव – गांव जाकर पुनर्निर्माण करने का संदेश लोगों, खासकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को देते रहे। 15 मई को बापू एक बार फिर डॉ. सयैद महमूद के साथ दिल्ली से पटना आए और 24 मई तक यहां रुके रहे। इस दौरान उन्होंने दानापुर, बाढ़, हिलसा,फतेहपुर, मनेर, हिलसा आदि जगहों का भ्रमण किया। गांधीजी के प्रयासों से बिहार अमन और भाईचारे की पटरी पर वापस लौट आया। बापू ने 8 अगस्त को सैयद महमूद के साथ पटना विवि के छात्रों को संबोधित किया और उन्हें सांप्रदायिक सदभाव की जरुरत की याद दिलायी। यह बिहार में बापू का आखिरी कार्यक्रम रहा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं एवं मीडिया – शोध के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

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