उस्ताद की विरासत – शहनाई

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चार में से तीन शहनाइयाँ तो चांदी की थीं। जो कहीं चांदी की ना भी होतीं तो भी चारों शहनाइयाँ बेशकीमती थीं – भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जो थीं! लिहाजा पुलिस ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स का गठन किया और सुरागों की खोजबीन शुरू हुई। रिपोर्ट के मुताबिक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बेटे काज़िम हुसैन जब घर लौटे थे तो उन्हें ताला टूटा हुआ मिला था और शहनाइयाँ गायब थीं। इसी सिलसिले में पांच दिसंबर को एफआईआर हुई थी। करीब एक महीने की खोजबीन के बाद पुलिस ने 11 जनवरी को इस मामले को सुलझा लेने का दावा किया।

तीन लोग गिरफ्तार हुए थे जिनमें से दो तो पेशे से सुनार थे और उन्होंने वो शहनाइयाँ चांदी की देखकर खरीदी थीं। चोरी करने वाला नज़रे हसन खुद काज़िम हुसैन का बेटा और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का पोता था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को ये तीन चांदी की शहनाइयाँ पीवी नरसिम्हा राव, लालू प्रसाद यादव, और कांग्रेसी कपिल सिब्बल ने भेंट की थीं। इन तीनों शहनाइयों को चांदी के लिए पिघला दिया गया था और वो 1 किलो के लगभग चांदी भी पुलिस ने बरामद कर ली थी। चौथी पूरी चांदी की नहीं थी, उसका सिर्फ चांदी का प्लेट उखाड़ा गया था।

विरासत के ख़त्म होने की दास्तानें अजीब होती हैं। बिहार के बक्सर (डुमराँव) इलाके से वाराणसी जाकर बस गए शिया मुस्लिम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई कोई मामूली चीज़ नहीं होती। संविधान लागू होने पर 1950 में जब भारत गणतंत्र घोषित हुआ था, उस दिन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने लाल किले पर शहनाई बजाई थी। उनकी ये शहनाइयाँ कुल 17000 रुपये के लिए पिघलाकर उनके ही पोते द्वारा बेच दी गयी। भारत रत्न से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की विरासत के लिए इतना काफी नहीं था। अभी और चोट पड़नी बाकी थी।

उनका वाराणसी का मकान भी खस्ताहाल था और उसे तुड़वा कर मरम्मत की बात हुई। परिवार में नए निर्माण को लेकर विवाद गहराया और आखिर तय हुआ कि किसी बिल्डर को देकर पूरा मकान ही गिरवा दिया जाए और उसकी जगह नयी ईमारत खड़ी हो। काम शुरू हो चुका था कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की दत्तक पुत्री सोमा घोष को इसका पता चल गया। उन्होंने वाराणसी डेवलपमेंट अथॉरिटी और नगर के डीएम से इसकी शिकायत की और निर्माण को नक्शा पास होने तक रोक दिया गया है। सोमा घोष और उस्ताद के दूसरे चाहने वाले इस मकान को संग्रहालय बनाना चाहते हैं।

उनकी पुण्यतिथि (21 अगस्त) के इतने करीब उनके मकान का टूटना कुछ ख़ास अच्छा भी नहीं लग रहा था। अस्सी-नब्बे तक के दशक में शास्त्रीय संगीत से जुड़े लोगों का बिहार से अच्छा समबन्ध रहता था। दुर्गा पूजा के अवसर पर करीब करीब हर कलाकार पटना में किसी न किसी पंडाल पर प्रस्तुति देने जरूर पहुँचता। समाजवाद के साथ ही ये परंपरा जाती रही। पिछले पच्चीस वर्षों में कोई भूले भटके भी इधर पहुंचा हो तो याद नहीं आता। बक्सर में जन्मे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए सरकार कुछ करेगी, ऐसा सोचना भी मजाक लगता है।

कलाकारों की और दुर्दशा देखें तो जिस आखरी संस्कृति मंत्री का नाम आता है, वो स्तरहीन भोजपुरी गीत लिखने के लिए जाने जाते थे। जानी-मानी ध्रुपद विधा में एक दरभंगा घराना भी हुआ करता था (अब भी है), लेकिन स्थानीय राजनीति ने कभी उनकी बात उठाई हो, ऐसा याद नहीं आता। हालाँकि मिथिला आन्दोलन के तौर पर राजनीती सौ वर्षों से जारी है, लेकिन वहां संस्कृति शायद पाग पहनने तक ही सिमित हो चुकी है। खान-पान, लेखन, कृषि, परम्पराओं, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी संस्कृति होती है ये शायद लोग वैसे ही भूल चुके हैं, जैसे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को।

बाकी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बारे में पढ़ना हो तो यतीन्द्र मिश्र की एक पतली सी किताब आती है (सुर की बिरादरी)। कुछ इंटरव्यू और संस्मरण जैसे लेखों का सौ-डेढ़ सौ पन्नों का संकलन है। कभी इस और ध्यान जाए तो देखिएगा!

आनंद कुमार

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